सोनभद्र (समर सैम) बिल्ली-मारकुंडी क्षेत्र की पत्थर खदानें पिछले कई वर्षों से ‘रेड ज़ोन’ में थीं-अतिदेय,अतिसंवेदनशील और हादसों की आशंका से घिरी हुई। लेकिन हैरानी की बात यह है कि इतने गंभीर हालात के बावजूद DGMS (Directorate General of Mines Safety) वर्षों तक खामोश बैठा रहा। बार-बार मिलने वाली चेतावनियों, लगातार बढ़ती दरारों और टूटते पहाड़ों के बीच विभाग की चुप्पी अब सवालों को और गहरा कर रही है। श्री कृष्ण खदान में हुए हालिया भीषण हादसे में 7 मज़दूरों की मौत के बाद अचानक DGMS की नींद टूटी। हादसे के तुरंत बाद भारी-भरकम नोटिस जारी किए गए, निरीक्षणों का दौर शुरू हुआ और कई खदानों को संचालन से रोक दिया गया। लेकिन ठीक इसी के बाद एक और चौंकाने वाला कदम सामने आया- लगभग 10 से 12 खदानों को DGMS ने अचानक ‘खानन की अनुमति’ दे दी, जबकि स्थानीय प्रशासन से लेकर मज़दूर संगठनों तक, हर कोई इन खदानों की जर्जर हालत से वाक़िफ़ है। यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब वर्षों से खदानें ख़तरे के नीचे तक ज़मीन में धँस चुकी थीं, तब DGMS क्यों शांत बैठा था? क्या विभाग का काम सिर्फ कागज़ी नोटिस जारी करना भर रह गया है? स्थानीय लोग तो इसे “हादसे के बाद जागने वाली मशीनरी” कहकर तंज कस रहे हैं। राजस्व को भारी चोट- मज़दूरों का भविष्य अधर में, बंदी और अनुमति के इस असमंजस ने जिले की अर्थव्यवस्था को झटका दिया है।
सोनभद्र की बिल्ली-मारकुंडी पत्थर पट्टी ही नहीं, पूरे पूर्वांचल में निर्माण कार्यों की रीढ़ कही जाती है। यहां से निकलने वाली डोलो स्टोन की सप्लाई आधे उत्तर प्रदेश और सीमावर्ती राज्यों तक जाती है। खदानें बंद होने से: निर्माण कार्यों पर ब्रेक लग गया, गिट्टी का बाज़ार ध्वस्त होने लगा, छोटे ठेकेदारों की जेब खाली हो गई और सबसे बड़ी चोट लगी हज़ारों मज़दूरों पर, जिनकी रोज़ी-रोटी खदानों से ही जुड़ी है
कई मज़दूर अब भुखमरी के कगार पर पहुँच चुके हैं, लेकिन विभागीय निर्णयों में पारदर्शिता का अभाव सबसे बड़ा संकट बन रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि DGMS का यह कदम- पहले सालों तक चुप्पी, फिर हादसे पर कड़क कार्रवाई और बाद में अचानक खदानों को ‘ग्रीन सिग्नल’- पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है।
स्थानीय उद्योग जगत इसे ‘तुग़लकी फ़रमान’ कह रहा है, जिससे खनन कारोबार पूरी तरह चरमराने लगा है। सबसे बड़ा सवाल-सुरक्षा या संरक्षकता? जनता पूछ रही है:
क्या विभागीय कार्रवाई सिर्फ हादसे के बाद काग़ज़ी खानापूर्ति है? क्या मज़दूरों की सुरक्षा से बड़ा कुछ और है?
और क्या वाकई खदानों की वास्तविक स्थिति में 15 दिन में इतना सुधार हो गया कि उन्हें दोबारा चलाने की अनुमति दे दी गई? सोनभद्र जैसे खनन-प्रधान जिले में, जहाँ हर घर की रोज़ी खदानों की धड़कन पर टिकी है, ऐसे प्रश्नों का जवाब देना शासन और विभाग दोनों की ज़िम्मेदारी है। फिलहाल, हालात यही बता रहे हैं कि हादसा सिर्फ पहाड़ नहीं गिराता, सिस्टम की पोल भी खोल देता है।
Author: Pramod Gupta
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