– मज़दूरों की खामोश चीखों ने प्रशासनिक दावों पर खड़े किए सवाल
सोनभद्र। बिरसा मुंडा जयंती के अवसर पर जब प्रदेश सरकार जनजातीय गौरव का उत्सव मना रही थी, उसी दौरान कुछ दूरी पर ज़मीन अचानक दरक गई-और उसके नीचे दब गए वे मजदूर, जिनकी आवाज़ अक्सर सरकारी फाइलों तक पहुँच ही नहीं पाती। जिला प्रशासन ने श्री कृष्णा माइंस वर्क्स की पत्थर खदान दुर्घटना में अब तक 7 मजदूरों की मौत की आधिकारिक पुष्टि कर दी है। तीन दिनों से चल रहे रेस्क्यू ऑपरेशन को रोक दिया गया है, जबकि स्थानीय ग्रामीणों और परिजनों का दावा है कि अभी भी कई मजदूर लापता हैं। इस घटना के बाद न सिर्फ खनन सुरक्षा मानकों पर सवाल उठे हैं, बल्कि मज़लूम मजदूरों के दर्द ने पूरे ज़िले को झकझोर दिया है। परिजनों की आँखों में इंतज़ार की आख़िरी लौ भी बुझने लगी है—क्योंकि तीन दिन बाद प्रशासन ने रेस्क्यू रोक दिया, जबकि खदान के नीचे कौन है, कितने हैं, इसका कोई आधिकारिक अंतिम आंकड़ा सार्वजनिक नहीं किया गया। याचिकाकर्ता ऋतिशा गोंड और उनके अधिवक्ता अभिषेक चौबे का कहना है कि इस खदान के संबंध में पहले से ही एनजीटी में 268 पृष्ठों की विस्तृत याचिका लंबित है, जिसमें खदान की गहराई, खड़ी दीवारों, फेरिटिक जोन के नीचे पानी निकालकर खनन जैसी जोखिमपूर्ण पद्धतियों को विस्तार से बताया गया था। उनका आरोप है कि अदालत को दिए गए व्यक्तिगत शपथ-पत्र में इन गंभीर तथ्यों को उचित रूप से प्रतिबिंबित नहीं किया गया। पर्यावरण कार्यकर्ता विकास शाक्य ने कहा कि मजदूरों की मौत केवल एक हादसा नहीं, बल्कि वर्षों से नियमों की अनदेखी और खनन कारोबार में बढ़ते “आर्थिक-प्रशासनिक गठजोड़” की परिणति हो सकती है। उन्होंने यह भी मांग उठाई कि खनन से जुड़े वित्तीय प्रवाह और निर्णय प्रक्रिया की जाँच पीएमएलए एक्ट 2002 के तहत कराई जाए, ताकि पता चले कि आखिर कौन लोग पर्दे के पीछे से इस खनन नेटवर्क को सहारा देते रहे। लापता मजदूरों के परिजनों का कहना है कि “हमारे अपने अभी भी मिट्टी के नीचे पड़े हो सकते हैं” यह वाक्य पूरे क्षेत्र के दर्द की व्यथा को बयां करता है।याचिकाकर्ता ने मृतकों के परिवारों को 50-50 लाख रुपये मुआवजा, सरकारी योजनाओं का लाभ और भविष्य में खनन सुरक्षा को लेकर कठोर कदम उठाने की मांग की है।इस हादसे ने फिर साबित किया है कि सोनभद्र की मिट्टी में सिर्फ खनिज नहीं, मजदूरों का खून भी मिला है-और जब तक पारदर्शी जांच और कठोर जवाबदेही तय नहीं होती, तब तक ऐसे हादसे केवल आंकड़ों में बदलते रहेंगे, इंसानों की ज़िंदगियों में नहीं।
Author: Pramod Gupta
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