सोनभद्र। राबर्ट्सगंज नगर पालिका की गौशाला का नाम सुनते ही लोगों को संरक्षण, सेवा और संवेदना की उम्मीद होती है। लेकिन हकीकत कुछ और ही है। यह गौशाला अब सिर्फ मृत गायों का घर बन चुकी है। यहाँ गायें जीवित नहीं रहतीं वे भूख, प्यास और लापरवाही के कारण दम तोड़ती हैं। यह दृश्य न केवल दर्दनाक है, बल्कि प्रशासनिक ढीठता और राजनीतिक पाखंड का भी प्रमाण है।
प्रतिदिन मृत गायें और मौन प्रशासन
गौशाला से रोज़ाना गायों के शव उठते हैं। यदि यह मानव बस्ती में होता तो जांच कमेटियाँ बनतीं और जिम्मेदारों के खिलाफ कार्रवाई होती। लेकिन यहाँ, क्योंकि यह “गऊ-माता” हैं, किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता। गौशाला कर्मियों का कहना है कि कई दिनों से गायों को सूखा भूसा के अलावा कुछ नहीं मिलता। न पर्याप्त चारा, न पानी, न दवा—कुछ भी नहीं। करोड़ों के बजट के बावजूद जमीन पर गायों की हालत इतनी दयनीय है कि वे हड्डियों के ढांचे में बदल चुकी हैं।
गऊ-सेवा का ढोल और वास्तविकता
सरकारी आंकड़ों में गौशाला में दाना, चारा, पानी और दवाई की पूरी व्यवस्था दिखायी जाती है। लेकिन हकीकत में ये गायें भूख और प्यास से तड़पती हैं। यही स्थिति प्रशासनिक संरक्षण में होती गऊ-माता की हत्या है। जिन नेताओं और अधिकारियों का काम इनकी निगरानी करना है, वे खुद इस भ्रष्ट व्यवस्था का हिस्सा हैं। मंचों पर गऊ-प्रेम का ढोल पीटना कोई मुश्किल नहीं, लेकिन जब वही लोग गायों की मौत के जिम्मेदार हैं, तो यह लापरवाही नहीं, बल्कि हत्या का संरक्षण है।
जिम्मेदारीहीन प्रशासन
कई महीनों में सैकड़ों गायें मर चुकी हैं, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। न FIR, न निलंबन, न कोई जिम्मेदार। यह स्थिति केवल एक विभाग की विफलता नहीं है, बल्कि पूरे सिस्टम की सड़न का प्रमाण है। यदि नगर के लोग, जनप्रतिनिधि और सामाजिक संगठन चुप रहते हैं, तो यह स्थिति और भयावह होगी। जिस गौशाला को गायों की सुरक्षा के लिए बनाया गया था, वही उनके कब्रगाह में बदल चुकी है। यह केवल दुख की बात नहीं, बल्कि प्रशासन और समाज के चरित्र पर कलंक भी है।
Author: Pramod Gupta
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