सोनभद्र (समर सैम) पत्थरों की जिन खदानों में विकास के नाम पर समृद्धि की कहानियाँ लिखी जानी चाहिए थीं, वहां आज मौत अपने पंजे गाड़कर बैठी है। सोनभद्र की कृष्णा माइंस एक बार फिर यह साबित कर चुकी है कि प्रशासनिक मिलीभगत, भ्रष्टाचार और लापरवाही अगर मिल जाएँ, तो धरती की कोख से सोना नहीं- मज़दूरों की लाशें निकला करती हैं। सबसे बड़ा सवाल जिलाधिकारी के उस हलफ़नामे पर है, जिसमें खदान में हो रहे खनन को पूरी तरह “मानक अनुरूप” बताया गया था। आज वही हलफ़नामा कटघरे में खड़ा है। स्थानीय लोगों और अधिवक्ताओं का कहना है कि वर्षों से नियमों के विपरीत खनन हो रहा था, चट्टानों को ऐसे चीरा जा रहा था जैसे मजदूरों की जान की कोई कीमत ही न हो। एनजीटी ने अवैध खनन की रिपोर्ट समय पर न देने पर जिलाधिकारी बी.एन. सिंह पर 10,000 रुपये का जुर्माना ठोंक दिया- यानी मौतों की कीमत आज भी कागज़ों में कुछ हजार रुपये ही है। उधर, प्रभारी मंत्री का शोक-संदेश और 20.55 लाख की आर्थिक मदद का ऐलान… सुनने में राहत जैसा, पर असलियत में यह मृतकों के खून को पैसे से धो डालने की बेशर्म कोशिश है। शनिवार देर शाम से चल रहा रेस्क्यू बताता है कि 18 के करीब मजदूर मौत की चट्टानों के नीचे दबे पड़े हैं। अब तक 8 शव बरामद, जिनमें दो सगे भाइयों की दिल दहला देने वाली मौत भी शामिल है। पर सवाल—जिम्मेदार कौन? निलंबित कौन? सजा किसे?
उत्तर- अब तक किसी को नहीं। ओबरा थाने में तीन के खिलाफ FIR, एक की गिरफ्तारी की चर्चा- लेकिन आधिकारिक पुष्टि तक नहीं। यानी मौतें आधिकारिक हैं, पर जिम्मेदारी अनौपचारिक! सबसे बड़ा तंज़- सीएम योगी उसी वक़्त घटना स्थल के पास मौजूद थे, पर फिर भी न सुरक्षा व्यवस्था, न कोई रोकथाम। क्या सरकार को यह खदानें “डेंजर जोन” नहीं दिखतीं? 2012 में एसपी मोहित अग्रवाल और एलआईयू ने स्पष्ट रिपोर्ट दी थी कि जिले की कोई भी पत्थर खदान संचालन योग्य नहीं। पर शासन ने आंखें मूंद लीं- और अब मजदूरों का लहू इन बंद आंखों को लाल कर रहा है। विपक्ष के जनप्रतिनिधियों को घटनास्थल से रोका जा रहा है- क्यों? सच दिख न जाए? सच बोल न दिया जाए?आज यह हादसा नहीं, एक संस्थागत हत्या है।
मज़दूरों की चीखें, पत्थरों में दबी साँसें और परिवारों का मातम यह पुकार रहा है कि—
“इन खदानों में सिर्फ पत्थर नहीं टूट रहे, सत्ता और व्यवस्था की इंसानियत टूट रही है।” जब तक शासन-प्रशासन की जवाबदेही तय नहीं होगी, यह धरती खदान नहीं-
मज़दूरों का कब्रिस्तान ही बनी रहेगी।
Author: Pramod Gupta
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