सोनभद्र (समर सैम) भाग 1: 17 फरवरी 2012, ओबरा- शारदा मंदिर के पीछे खदान धँसी, 12 मजदूर दफन… और एक FIR जिसने पूरे जिले को हिला दिया। सोनभद्र की धरती 17 फरवरी 2012 को उस वक़्त काँप उठी जब ओबरा के शारदा मंदिर के पीछे पत्थर खदान अचानक धँस गई।
धमाके की गड़गड़ाहट के बाद 12 मजदूर पत्थरों के नीचे जिंदा दफन हो गए। वो चीखें आज भी ओबरा की हवा में तैरती हैं।
कौन–कौन जेल गया था?
इस हादसे के बाद तत्कालीन प्रशासन ने बड़ी कार्रवाई की थी। जिनके नाम FIR में आए और बाद में जेल भेजे गए उनमें शामिल थे। फौजदार सिंह (खदान लीज से संबंधित एक मुख्य नाम) खदान से जुड़े स्थानीय प्रबंधक और ठेकेदार (जानकारी के अनुसार कई लोगों को हिरासत में भी लिया गया था)
ब्लास्टिंग कराने वाले दो तकनीशियन
मलवा हटाने के लिए लगाया गया एक ठेका संचालक
2012 की FIR में क्या लिखा था? FIR में मुख्य आरोप इस प्रकार दर्ज किए गए थे।
अवैध और मानकों के विपरीत ब्लास्टिंग
खदान की सुरक्षा दीवार, सुरक्षा जाल और चेतावनी संकेत पूरी तरह अनुपस्थित। मजदूरों को सुरक्षा उपकरण न देना गहराई सीमा से कई गुना नीचे खनन
DGMS (माइंस सेफ्टी विभाग) के नियमों का खुला उल्लंघन
लापरवाही से मृत्यु” (IPC 304A) अवैध खनन” व “राजस्व की हानि” (माइनिंग एक्ट की धाराएँ)
टैक्स चोरी और रॉयल्टी चोरी
खदान मालिक और संचालक द्वारा सुरक्षा निर्देशों का जानबूझकर उल्लंघन 2012 में प्रशासनिक कार्रवाई क्या हुई थी? उस समय की सरकार (सपा) ने भारी दबाव में बड़ी कार्रवाई की थी।
DM को हटाया गया (तत्काल प्रभाव से स्थानांतरित)
SP को बदला गया
खनन विभाग के कई कर्मचारी निलंबित, ओबरा इलाके की सभी खदानें बंद, पूरे सोनभद्र में सुरक्षा ऑडिट का आदेश, कई खदान मालिकों के खिलाफ लगातार छापे और जब्ती, 2012 की घटना को सोनभद्र का सबसे बड़ा खदान हादसा कहा गया था।
भाग-2: श्रीकृष्णा माइनिंग में फिर वही चीखें- हज़ारों टन पत्थर धड़ाम… 16 मजदूरों के दबे होने की आशंका सोनभद्र की धरती एक बार फिर वही मंजर देख रही है। हजारों टन पत्थर नीचे, मजदूरों की सांसें ऊपर… और ऊपर बैठे लोग चुप। श्रीकृष्णा माइनिंग वाली खदान में शनिवार को बड़ा हादसा हुआ। लोगों का कहना है कि करीब 16 मजदूर अंदर दबे पड़े हैं। तीन दिन से बिना रुके बचाव कार्य जारी है।
चारों तरफ पुलिस का सुरक्षा घेरा है। लेकिन मजदूरों की चीखें पहाड़ों को चीर रही हैं और सरकार चुप है। FIR किन-किन पर दर्ज हुई?
इस वर्तमान हादसे में FIR दर्ज हुई
1. मधुसूदन सिंह (खदान प्रोप्राइटर) 2. दिलीप केशरी (सह-प्रोप्राइटर/प्रबंधक) 3. एक अज्ञात व्यक्ति (ब्लास्टिंग/ऑपरेशन से संबंधित)
धाराएँ
IPC 304, 304A (गैर इरादतन हत्या / लापरवाही से मौत) माइनिंग एक्ट, रॉयल्टी चोरी, सुरक्षा मानकों के उल्लंघन, श्रमिक सुरक्षा अधिनियम
सबसे बड़ा सवाल : यहां किसी अधिकारी को निलंबित क्यों नहीं किया गया?
न DM पर कार्रवाई, न SP पर, न खनन अफसर पर, न खदान सुरक्षा अधिकारियों पर। हैरत की बात यह है कि
“बंदी के आदेश” के बाद भी खदान में रात-दिन खनन चलता रहा। CM के दौरे के दिनों में भी मशीनें चलती रहीं। लेकिन प्रशासन आँखें बंद किए बैठा रहा।
अवैध खनन, टैक्स चोरी और पर्यावरण को चीरने का खेल
दोनों हादसों में एक चीज समान है। मानकों के विपरीत खनन, जबरदस्त टैक्स चोरी, खदान की सुरक्षा शून्य, मजदूरों को जानवरों से भी बदतर हालात में काम करने को मजबूर करना, रॉयल्टी चोरी
पर्यावरण को चीर-फाड़ कर पत्थर निकालने का लालच
लोकल अधिकारियों की मिलीभगत
ठेकेदार- मालिक- प्रशासन की त्रिकोणीय सांठगांठ
विपक्षी नेताओं और जनप्रतिनिधियों को खदान में जाने नहीं दिया जा रहा
ताकि असली सच्चाई बाहर न आ सके। ताकि यह न दिखे कि 16 मजदूरों के शव कैसे पत्थरों के नीचे पड़े हो सकते हैं।
ताकि यह न दिखे कि मशीनों ने किस हद तक पहाड़ को खोखला कर दिया था।
2012 की तरह इस बार सरकार का रुख अलग क्यों?
2012 में
✔ खदानें बंद हुईं
✔ बड़े अफसर हटे
✔ गिरफ्तारियाँ हुईं
✔ कड़ी कार्रवाई हुई
2025 में
❌ कोई अधिकारी सस्पेंड नहीं
❌ कोई बड़ा चेहरा गिरफ्तार नहीं
❌ सरकार खामोश
Author: Pramod Gupta
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