– न्याय की आंधी में बिखरती रोज़ी-रोटी शास्त्रीनगर मेरठ का मर्मस्पर्शी दृश्य
मेरठ (समर सैम) मेरठ के शास्त्रीनगर में जब सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर बुलडोज़र की गड़गड़ाहट गूंजी, तो सिर्फ़ दीवारें ही नहीं टूटीं, कई परिवारों की उम्मीदें भी मलबे में दफ़न हो गईं। यह वही कॉम्प्लेक्स था जो पिछले तीन दशकों से सैकड़ों लोगों की आजीविका का आधार बना हुआ था चाय-नाश्ते की छोटी दुकानों से लेकर बुटीक और स्टेशनरी तक। अदालत का आदेश निस्संदेह कानून के पालन और शहर के नियोजन की दृष्टि से सही है, पर इस कार्रवाई की चपेट में आए आम व्यापारी की वेदना शब्दों में बयां करना आसान नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा था कि यह निर्माण आवासीय भूमि पर अवैध रूप से किया गया था। प्रशासन को वर्षों पहले इसे हटाना चाहिए था, मगर विभागीय लापरवाही और मिलीभगत ने इसे “स्थायी बाज़ार” बना दिया। अब जब न्याय की गाड़ी आख़िरकार चली, तो सारा भार उन छोटे व्यापारियों पर आ गिरा जिनका इन कानूनी पेचीदगियों से कोई वास्ता नहीं था। ढहते हुए दुकानों के बीच कई व्यापारी अपने टूटते बोर्डों और बिखरे सामानों के साथ रो पड़े। किसी ने कहा, “हमने तो टैक्स भरा, बिजली का बिल दिया, तो हमें कैसे पता चलता कि ज़मीन अवैध है।” किसी बुज़ुर्ग दुकानदार ने मलबे के ढेर को देखते हुए कहा, “हमारी उम्र इसी दुकान में बीत गई, अब कहाँ जाएँ?” ये आवाज़ें प्रशासनिक रिपोर्टों में दर्ज नहीं होतीं, मगर समाज के दिल में गूंजती हैं। यह घटना हमें याद दिलाती है कि कानून का शासन और मानवीय संवेदना, दोनों का संतुलन ज़रूरी है। यदि नगर विकास प्राधिकरण समय रहते कार्रवाई करता, तो सैकड़ों परिवार आज सड़कों पर नहीं होते। न्याय तब ही पूर्ण होता है जब उसका क्रियान्वयन इंसाफ़ और इंसानियत दोनों की रक्षा करे।शास्त्रीनगर की यह घटना सिर्फ़ एक अवैध निर्माण की कहानी नहीं है। यह उन मेहनतकश हाथों की भी कहानी है जो कानून की भूलभुलैया में कुचले गए। अब प्रशासन की ज़िम्मेदारी है कि पुनर्वास और वैकल्पिक व्यवस्था के ज़रिए इन प्रभावित परिवारों की मदद करे। क्योंकि बुलडोज़र विकास का प्रतीक तब बनता है, जब उसके पीछे टूटे दिलों के लिए भी कोई आसरा छोड़ा जाए।
Author: Pramod Gupta
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