आगरा। आगरा से आई दर्दनाक ख़बर ने पूरे प्रदेश और देश को गमगीन कर दिया। दुर्गा विसर्जन के पावन अवसर पर जहां श्रद्धा और उल्लास का माहौल होना चाहिए था, वहां मातम पसर गया। यमुना नदी में नाव पलटने से 11 लोगों की असमय मौत ने न केवल कई परिवारों को उजाड़ दिया बल्कि प्रशासनिक लापरवाही और सुरक्षा इंतज़ामात की पोल भी खोल दी। यह हादसा केवल एक दुर्घटना भर नहीं है, बल्कि उन सवालों को ज़िंदा करता है जो हर साल धार्मिक आयोजनों और जुलूसों के दौरान उठते हैं- क्या हमारी व्यवस्था लोगों की जान की कीमत समझती है? दुर्गा पूजा और विसर्जन उत्तर भारत ही नहीं, पूरे देश में आस्था और सामाजिक एकता का बड़ा पर्व है। लाखों लोग इसमें शिरकत करते हैं। लेकिन इतनी भीड़, जलमार्ग का उपयोग और भावनाओं के उफान में अक्सर सुरक्षा के नियम दरकिनार कर दिए जाते हैं। आगरा की इस घटना में भी यही हुआ। क्षमता से अधिक लोगों को नाव में बैठाना, लाइफ जैकेट या सुरक्षा इंतज़ाम का न होना और निगरानी की कमी- इन सबने मिलकर यह त्रासदी गढ़ दी। प्रशासन हर बार कड़े निर्देश और गाइडलाइन जारी करता है, लेकिन उनका पालन शायद ही कभी जमीनी स्तर पर हो पाता है। विसर्जन के लिए सुरक्षित घाट, गोताखोरों की तैनाती, नाविकों की संख्या और सुरक्षा उपकरणों की उपलब्धता जैसे कदम केवल कागज़ों में दर्ज रह जाते हैं। नतीजा यह कि खुशियों का त्योहार पल भर में मातम में बदल जाता है। यह सच है कि हादसे होने पर केवल प्रशासन को दोष देना पर्याप्त नहीं। समाज और आयोजकों की भी जिम्मेदारी बनती है। लोग अपनी सुरक्षा को अक्सर किस्मत या आस्था के भरोसे छोड़ देते हैं। भीड़ नियंत्रण और अनुशासन का पालन आमतौर पर नजरअंदाज किया जाता है। जब तक नागरिक भी अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेंगे, तब तक ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति होती रहेगी। अब समय है कि सरकार और स्थानीय प्रशासन इस त्रासदी से सबक लें। धार्मिक आयोजनों को पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाने का अधिकार सबको है, लेकिन जीवन से बढ़कर कुछ नहीं। यदि विसर्जन के लिए वैकल्पिक तालाब और कृत्रिम सरोवर उपलब्ध कराए जाएं, नावों की संख्या और सुरक्षा मानकों पर सख्ती हो, और आयोजन समितियों को भी जवाबदेह बनाया जाए, तभी भविष्य में ऐसी घटनाओं से बचा जा सकता है।आगरा की यह दुर्घटना उन ग्यारह मासूम जिंदगियों को लौटाकर तो नहीं ला सकती, लेकिन यह चेतावनी जरूर है कि हमें उत्सव और सुरक्षा के बीच संतुलन साधना ही होगा। श्रद्धा का अर्थ लापरवाही नहीं है। अगर हम हर पर्व पर सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दें, तभी आस्था का उत्सव सच्चे अर्थों में जीवनदायी बन सकेगा।
Author: Pramod Gupta
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