राजस्थान। राजस्थान से आई यह भयावह ख़बर हर संवेदनशील हृदय को झकझोर देती है। मुख्यमंत्री निःशुल्क दवा योजना गरीब और वंचित तबके को राहत पहुँचाने के लिए बनी थी, लेकिन जब उसी योजना के तहत मिली खांसी की दवा ने सात मासूम बच्चों की जान ले ली, तो सवाल केवल स्वास्थ्य तंत्र की लापरवाही पर नहीं, बल्कि पूरे शासन-प्रशासन की निष्ठुरता पर खड़े होते हैं। माता-पिता जिन्होंने अपने बच्चों को यह सोचकर दवा पिलाई कि सरकार की ओर से मुफ्त दी जा रही है, वह सुरक्षित होगी, आज अपने नन्हे कफ़न देख रहे हैं। उनके आंसू, उनकी चीखें, अस्पताल के गलियारों में गूंजती करुण पुकार हमें बताती है कि व्यवस्था ने उन्हें धोखा दिया। पीड़ा और बेबसी से भरे ये परिवार पूछ रहे हैं—क्या गरीबों का जीवन इतना सस्ता है कि उसे अपरीक्षित दवाओं पर दांव पर लगा दिया जाए? डॉक्टर ताराचन्द योगी और दो अन्य चिकित्सकों ने जब यह सिरप खुद पीकर साबित करने की कोशिश की कि यह सुरक्षित है, तो उनकी हालत भी बिगड़ गई। यह घटना केवल दवा की जहरीली हकीकत ही नहीं, बल्कि उस सिस्टम की भयावह पोल भी खोलती है जो बिना जांच-पड़ताल, बिना गुणवत्ता प्रमाणपत्र के बच्चों तक दवा पहुँचा देता है। सवाल उठना लाजिमी है कि क्या सरकारी योजनाओं के नाम पर बांटी जाने वाली दवाएं क्लिनिकल और लैब टेस्टिंग से भी नहीं गुजरतीं? यह त्रासदी हमें बताती है कि हमारे स्वास्थ्य ढांचे में केवल कागजी खानापूर्ति हो रही है। सरकारी अमले का रवैया असंवेदनशील और बेतरतीब है। जिन अधिकारियों का कर्तव्य था कि हर दवा की गुणवत्ता सुनिश्चित करें, वे शायद फाइलों और ठेकेदारों के खेल में उलझे रहे। नतीजा यह निकला कि गरीब बच्चे अपनी जान देकर सिस्टम की कीमत चुका बैठे।
सरकार को चाहिए कि:
इस पूरे प्रकरण की न्यायिक जांच करवाए।
दोषी दवा निर्माता और अधिकारियों पर कठोर कार्रवाई हो।
पीड़ित परिवारों को पर्याप्त मुआवज़ा और न्याय मिले।
आगे से किसी भी योजना में दवा वितरण से पहले अनिवार्य गुणवत्ता परीक्षण को सुनिश्चित किया जाए।
यह सम्पादकीय केवल एक खबर पर टिप्पणी नहीं है; यह उस इंसानियत की चीख है जिसे अनसुना कर दिया गया। अगर सरकारी दवा ही ज़हर साबित होने लगे तो आम आदमी किस पर भरोसा करे? यह सवाल सरकार के माथे पर कलंक की तरह चिपका रहेगा- क्योंकि ज़िंदगी की सबसे बड़ी उम्मीद, इलाज, अब डर का पर्याय बन गई है।
Author: Pramod Gupta
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