वाराणसी। वाराणसी की धरोहर, काशी की शान और भारतीय शास्त्रीय संगीत के अमिट हस्ताक्षर पंडित छन्नूलाल मिश्रा के निधन ने पूरे देश को गहरे शोक में डाल दिया है। वह केवल एक गायक नहीं थे, बल्कि शास्त्रीय संगीत की उस परंपरा के वाहक थे जिसने काशी की पहचान को वैश्विक स्तर पर जीवंत बनाए रखा। उनके निधन के साथ ऐसा लगता है मानो स्वर-संसार का एक दीपक बुझ गया हो, जो सदियों तक पीढ़ियों को रौशन करता रहा। पंडित छन्नूलाल मिश्रा ने अपने जीवन को शास्त्रीय संगीत, ठुमरी, दादरा, कजरी और भजन की साधना को समर्पित किया। उनकी गायकी केवल तकनीक नहीं थी, बल्कि आत्मा से उपजी वह अनुभूति थी जो श्रोताओं को भक्ति और रस में डुबो देती थी। उन्होंने बनारस घराने की परंपरा को न केवल संजोया बल्कि आधुनिक समय में भी उसकी प्रासंगिकता सिद्ध की। उनकी आवाज़ में गंगा-जमुनी तहज़ीब की झलक मिलती थी—जहां भक्ति भी थी, सूफियाना रंग भी और लोकधारा की मिठास भी। उनकी उपलब्धियों की लंबी सूची है। भारत सरकार ने उन्हें 2010 में पद्म भूषण और 2016 में देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से अलंकृत किया। इसके अलावा उन्हें उत्तर प्रदेश सरकार का यश भारती सम्मान और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार भी प्राप्त हुआ। वे राज्यसभा में नामित सदस्य भी रहे। यह सम्मान उनकी उस साधना का प्रतीक है, जो दशकों तक भारतीय शास्त्रीय संगीत की सेवा के लिए समर्पित रही। काशी की सांस्कृतिक विरासत में उनका योगदान अविस्मरणीय है। उन्होंने काशी विश्वनाथ मंदिर से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक भारत की शास्त्रीय परंपरा का परचम लहराया। उनके सुरों ने सीमाओं को लांघकर दुनिया को बताया कि भारतीय संगीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि साधना है। आज जब उनका पार्थिव शरीर मिर्जापुर से वाराणसी लाया जा रहा है और मणिकर्णिका घाट पर अंतिम संस्कार होगा, तब पूरे काशी में शोक की लहर है। गंगा किनारे की वह धरती जिसने उन्हें जन्म दिया और स्वर साधना का आकाश दिया, वही आज उन्हें अपने आंचल में समेट लेगी। पंडित छन्नूलाल मिश्रा का जाना भारतीय संगीत जगत के लिए अपूरणीय क्षति है। किंतु यह भी सत्य है कि महान कलाकार देह त्यागने के बाद भी अमर रहते हैं। उनके स्वर, उनकी रिकॉर्डिंग्स और उनकी परंपरा आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देती रहेगी। संगीत की इस अनंत धारा में पंडित जी का योगदान सदैव एक मील का पत्थर रहेगा। आज आवश्यकता है कि सरकार, संस्थान और संगीत प्रेमी मिलकर उनकी विरासत को और अधिक संरक्षित करें। यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
Author: Pramod Gupta
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