लखनऊ (समर सैम) जिला कारागार में सोमवार को घटी घटना ने एक बार फिर जेल सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। पूर्व मंत्री गायत्री प्रसाद प्रजापति पर उसी जेल के एक बंदी द्वारा हमला किया जाना केवल एक व्यक्ति पर हमले की घटना नहीं है, बल्कि यह इस बात का संकेत है कि जेल व्यवस्था में आंतरिक अनुशासन और निगरानी कितनी ढीली है। जानकारी के अनुसार, गायत्री प्रसाद प्रजापति जेल अस्पताल में भर्ती थे और वहीं सफाई ड्यूटी पर लगे एक बंदी से उनका विवाद हुआ। विवाद इतना बढ़ा कि धक्का-मुक्की के बाद आरोपी बंदी ने अलमारी के हिस्से से उन पर वार कर दिया। प्रारंभिक खबरों में वार को ‘कैंची से हमला’ बताया गया, जबकि कारागार प्रशासन ने सफाई दी है कि चोट सतही थी और तत्काल उपचार से पूर्व मंत्री की स्थिति सामान्य है। फिर भी यह सवाल अपनी जगह बरकरार है कि जेल के भीतर इस तरह की हिंसक स्थिति उत्पन्न ही क्यों हुई। जेल प्रशासन का कहना है कि आवश्यक कार्रवाई की जा रही है और आरोपी बंदी से पूछताछ हो रही है। लेकिन केवल कार्रवाई भर कर देना पर्याप्त नहीं है। जेल जैसे संवेदनशील संस्थान में यदि कैदियों के बीच तनातनी हिंसा का रूप लेने लगे, तो यह संकेत है कि वहां अनुशासन और निगरानी की कमी है। खासकर तब, जब मामला किसी हाई-प्रोफाइल कैदी का हो। गायत्री प्रसाद प्रजापति पूर्व में खनन घोटाले और अन्य मामलों में सुर्खियों में रहे हैं। ऐसे में उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी जेल प्रशासन की और अधिक बढ़ जाती है। यह घटना केवल सुरक्षा ही नहीं, बल्कि जेल सुधार के व्यापक मुद्दे को भी सामने लाती है। जेलों में भीड़, कैदियों की आपसी रंजिश, गुटबाज़ी और निगरानी की कमी अक्सर ऐसे हालात पैदा करती है। आवश्यक है कि जेल प्रशासन पारदर्शिता और कठोर अनुशासन के साथ कार्य करे, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो। न्याय व्यवस्था के अंतर्गत जेल एक दंड स्थल होने के साथ-साथ सुधार का भी केंद्र होना चाहिए। यदि जेल ही हिंसा और असुरक्षा का गढ़ बन जाए तो न केवल कैदियों की सुरक्षा पर प्रश्न उठेंगे बल्कि यह पूरी न्याय व्यवस्था की साख पर भी चोट करेगा। लखनऊ की घटना इस दिशा में चेतावनी है कि कारागारों को केवल चारदीवारी में कैद जगह मानकर नहीं चलना चाहिए, बल्कि उनकी सुरक्षा, अनुशासन और प्रशासन पर लगातार पैनी निगाह रखनी होगी।
Author: Pramod Gupta
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