प्रयागराज (समर सैम) कर्नलगंज थाना क्षेत्र स्थित बैंक रोड पर विकास प्राधिकरण की टीम जब एक विवादित मकान को ध्वस्त करने पहुँची तो हालात अचानक तनावपूर्ण हो उठे। बड़ी संख्या में वकील मौके पर इकट्ठा हो गए और उन्होंने प्रशासनिक कार्रवाई का विरोध किया। विरोध की अगुवाई कर रही एक पीड़ित बुज़ुर्ग महिला का कहना है कि मकान पर बुलडोज़र चलवाने के पीछे प्रदेश के एक वरिष्ठ अधिकारी का दबाव है। यह आरोप और भी गंभीर इसलिए हो जाता है क्योंकि जिस अधिकारी का नाम सामने आ रहा है, हिमांशु कुमार, वे डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य के पर्सनल सेक्रेटरी बताए जा रहे हैं। इस प्रकरण ने शहर की सियासत और प्रशासनिक निष्पक्षता दोनों पर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। सवाल यह है कि आखिरकार क्या वजह रही कि एक विवादित संपत्ति पर कार्रवाई करने से पहले सभी पक्षों को सुना नहीं गया? यदि मकान वाकई अवैध निर्माण की श्रेणी में आता है तो निश्चित ही उस पर कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन यदि कार्रवाई किसी दबाव या पक्षपात में की जा रही है तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था और न्याय व्यवस्था दोनों पर आघात है। वकीलों का विरोध और बड़ी संख्या में उनकी उपस्थिति यह संकेत देती है कि मामला केवल संपत्ति विवाद का नहीं बल्कि न्याय के बुनियादी अधिकारों से जुड़ा हुआ है। जब न्याय के संरक्षक ही अपने बीच की एक महिला पीड़ित के साथ खड़े हो जाते हैं, तो प्रशासन को अवश्य ही आत्ममंथन करना चाहिए। एक बुज़ुर्ग महिला के मकान पर बुलडोज़र चलाने से पहले क्या वैकल्पिक समाधान या कानूनी प्रक्रिया पूरी की गई? क्या संबंधित पक्ष को सुनवाई का अवसर मिला? ये प्रश्न अनुत्तरित हैं। यह घटना उन तमाम बहसों को भी हवा देती है कि बुलडोज़र संस्कृति किस हद तक नागरिक अधिकारों और न्यायिक प्रक्रिया की अनदेखी कर रही है। विकास प्राधिकरण का दायित्व है कि वह नियमों का पालन कर शहर को व्यवस्थित बनाए, परंतु जब यही प्रक्रिया पक्षपात या शक्ति-प्रदर्शन के तौर पर इस्तेमाल होती है तो जनमानस का भरोसा डगमगाने लगता है। आवश्यक है कि इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच हो और सच्चाई सामने आए। यदि ध्वस्तीकरण न्यायसंगत था तो उसे ठोस सबूतों और पारदर्शी प्रक्रिया के साथ लागू किया जाए, और यदि इसमें दबाव या पक्षपात की बू आती है तो जिम्मेदार अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई हो। न्याय के शहर प्रयागराज की गरिमा इसी में है कि यहाँ न सिर्फ़ गंगा-जमुनी तहज़ीब बसी है बल्कि न्याय की निष्पक्षता भी अक्षुण्ण रहे। शहर की आवाज़ यही कहती है- विकास हो, पर न्याय की बुनियाद पर
Author: Pramod Gupta
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