ज़ुल्म जब हद से बढ़ जाता है, तो मिट जाता है,
हक़ की आवाज़ दबे चाहे, मगर उठ ही जाता है।
– ब्रिटेन द्वारा फिलिस्तीन को एक स्वतंत्र राज्य के रूप में मान्यता दिए जाने के बाद, लंदन स्थित PLO आफिस, नए देश फिलिस्तीन मुख्यालय बनाया गया, फ़िलिस्तीनी झंडा लगाया गया!
ब्रिटेन। पिछले चौबीस घंटों में अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक बड़ा बदलाव दर्ज़ हुआ है। ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और पुर्तगाल जैसे प्रभावशाली देशों ने फिलिस्तीन को औपचारिक मान्यता देकर वैश्विक परिदृश्य में हलचल मचा दी है। इन देशों के कदम के बाद फिलिस्तीन को मान्यता देने वाले देशों की संख्या अब लगभग 150 तक पहुँच गई है। यह आंकड़ा केवल कूटनीतिक समर्थन नहीं, बल्कि इस बात का स्पष्ट संकेत है कि पूरी दुनिया फिलिस्तीन के पक्ष में खड़ी होती जा रही है और इजराइल धीरे-धीरे अकेला पड़ रहा है। फिलिस्तीन मुद्दा दशकों से मध्य पूर्व की राजनीति का सबसे जटिल और विवादास्पद प्रश्न रहा है। संयुक्त राष्ट्र की कई प्रस्तावों के बावजूद यह मसला हल नहीं हो सका। इजराइल की नीतियाँ, बस्तियों का विस्तार और गाज़ा में लगातार हिंसा ने विश्व जनमत को गहराई से प्रभावित किया है। यही वजह है कि पहले जहां फिलिस्तीन को समर्थन मुख्यतः एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका से मिलता था, अब यूरोप और पश्चिमी देशों का रुख भी उसके पक्ष में झुकने लगा है। ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश, जिन्हें लंबे समय तक इजराइल के करीबी सहयोगी माना जाता रहा है, अब फिलिस्तीन के अधिकारों की वकालत करने लगे हैं। यह बदलाव केवल एक औपचारिक घोषणा नहीं है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में शक्ति-संतुलन के बदलते समीकरण की गवाही भी है। इजराइल के लिए यह स्थिति बेहद चुनौतीपूर्ण है क्योंकि अमेरिका के अलावा अब उसके पुराने सहयोगी भी उसके साथ कदमताल करने में हिचकिचा रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र महासभा और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर लगातार आलोचना झेल रहे इजराइल के लिए यह एक गहरी कूटनीतिक पराजय के रूप में देखा जा सकता है। दूसरी ओर, फिलिस्तीन के लिए यह एक मनोबल बढ़ाने वाला क्षण है। इतने बड़े पैमाने पर वैश्विक मान्यता उसे न केवल वैधता प्रदान करती है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय संस्थानों और समझौतों में उसका हस्तक्षेप भी मज़बूत करेगी। इससे शांति वार्ताओं और दो-राष्ट्र समाधान की दिशा में नए रास्ते खुल सकते हैं।हालांकि यह भी सच है कि मान्यता मिल जाने भर से संघर्ष समाप्त नहीं होगा। ज़मीनी स्तर पर गाज़ा और वेस्ट बैंक में हिंसा, बस्तियों का सवाल और लाखों शरणार्थियों की पीड़ा अब भी वैसी ही है। लेकिन इतना तय है कि इजराइल को अब अंतरराष्ट्रीय दबाव का सामना पहले से कहीं अधिक करना पड़ेगा। वैश्विक राजनीति में अकेले पड़ते देश अक्सर कठोर नीतियों पर पुनर्विचार करने के लिए बाध्य होते हैं।आज की दुनिया इंसाफ़ और मानवाधिकार की मांग कर रही है। फिलिस्तीन को मिल रही यह बढ़ती मान्यता उसी न्याय की पुकार है। अब यह देखना होगा कि इजराइल अपने अड़ियल रुख़ को छोड़कर वार्ता और समाधान की ओर बढ़ता है या फिर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पूरी तरह अलग-थलग पड़ जाता है। निष्कर्षतः, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और पुर्तगाल का यह निर्णय केवल फिलिस्तीन के लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक संदेश है- अन्याय और कब्ज़े के खिलाफ आवाज़ चाहे देर से उठे, लेकिन जब उठती है तो उसका असर व्यापक होता है। दुनिया बदल रही है और इस बदलाव में इजराइल को अपनी नीतियों पर गंभीर आत्ममंथन करना ही होगा।
हक़ की राह में चाहे कितनी मुश्किलें आएँ,
फ़तह उसी की है जो सब्र से डटा रह जाए।
Author: Pramod Gupta
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