– सियासत के महलों में उजाला बहुत है,
मगर अंधेरों में बिकता है ईमान हर रोज़…
असम (समर सैम) असम में भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू हुई मुहिम ने एक बार फिर सत्ता और प्रशासन की काली परतों को उघाड़ दिया है। मुख्यमंत्री विशेष सतर्कता सेल ने हाल ही में असम सिविल सेवा (ACS) की अधिकारी नूपुर बोरा के घर छापा मारा और वहाँ से 90 लाख रुपये नकद और एक करोड़ से अधिक के गहने बरामद किए। कुल मिलाकर लगभग दो करोड़ की बेहिसाब संपत्ति के खुलासे ने राज्य की ईमानदारी पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। यह सिर्फ़ एक अफ़सर का मामला नहीं है, बल्कि पूरी व्यवस्था की बीमारी का आईना है। सवाल यह है कि जो अफ़सर जनता की सेवा और न्याय की रक्षा के लिए नियुक्त किए जाते हैं, वही जब रिश्वतखोरी और काली कमाई में लिप्त पाए जाते हैं तो लोकतंत्र की बुनियाद कितनी खोखली नज़र आती है। भ्रष्टाचार अब केवल आर्थिक अपराध नहीं रहा, बल्कि यह जनता के विश्वास पर सबसे बड़ा हमला है। असम सरकार ने भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग का बिगुल बजाया है, लेकिन खतरा यह है कि यह महज़ “शो-पीस” कार्रवाई बनकर रह जाए। आज ज़रूरत है कि सभी उच्चाधिकारियों की संपत्तियों की गहन और पारदर्शी जांच हो। केवल एक-दो मामलों को उजागर करने से काम नहीं चलेगा। हर वरिष्ठ अधिकारी की संपत्ति का वार्षिक ऑडिट हो और जनता को यह जानकारी उपलब्ध कराई जाए कि किसने अपनी कमाई के बूते पर घर बनाया और किसने जनता की गाढ़ी कमाई लूटी। “सच तो यह है कि रिश्वतखोर अफ़सर केवल खुद गुनहगार नहीं,
वे जनता की उम्मीदों के भी कातिल हैं।” सख़्ती सिर्फ़ छापेमारी तक सीमित न रहे। ज़रूरी है कि ऐसे मामलों की सुनवाई फास्ट-ट्रैक अदालतों में हो और दोषी अधिकारियों को कठोर सज़ा दी जाए। राजनीतिक संरक्षण की ढाल को तोड़े बिना यह जंग अधूरी रहेगी। भ्रष्टाचारियों को कोई राहत न मिले और उनके खिलाफ न केवल आर्थिक बल्कि प्रशासनिक और सामाजिक कार्रवाई भी की जाए। आज जनता का भरोसा तभी लौटेगा जब वह देखेगी कि कानून का शिकंजा वास्तव में कस रहा है। वरना यह डर हमेशा बना रहेगा कि “बड़े लोग” बच निकलेंगे और गरीब जनता ही पिसती रहेगी। “हक़-ए-इंसाफ़ की जब भी तिज़ारत हुई,
ख़ामोशी से लोकतंत्र की सियासत हुई।” असम में शुरू हुआ यह अभियान केवल एक राज्य की नहीं बल्कि पूरे देश की चुनौती है। भ्रष्टाचार किसी एक विभाग या प्रदेश तक सीमित नहीं है, यह पूरे तंत्र को खोखला कर चुका है। इसलिए नूपुर बोरा का मामला सबक होना चाहिए और यह अभियान देशव्यापी स्वरूप ले। अगर सरकार सच्चे इरादे से सभी उच्चाधिकारियों की संपत्तियों की तफ्तीश कर सके तो यह लोकतंत्र की सबसे बड़ी जीत होगी। यही वह रास्ता है जिससे जनता का विश्वास लौटेगा और भ्रष्टाचारियों की जड़ें काटी जा सकेंगी। “अब तो हक़ीक़त यही है, ऐ हुक्मरानों सुन लो,
तफ्तीश होगी सभी की- छोटों की नहीं, बड़ों की भी…”
Author: Pramod Gupta
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