शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले,
वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा।
भारत (समर सैम) भारत और पाकिस्तान के बीच दुबई में खेले जा रहे क्रिकेट मैच ने करोड़ों देशवासियों के दिलों में जोश भी भरा और सवाल भी खड़े किए। पाकिस्तान, जो भारत विरोध और आतंकवाद का सबसे बड़ा प्रायोजक है, उससे मैत्रीपूर्ण खेल संबंध रखना आखिर किसकी मजबूरी है? क्या यह उन शहीदों के लहू का अपमान नहीं, जिनकी जान पाक प्रायोजित आतंकवाद ने छीनी है? पहलगाम में निर्दोष भारतीय पर्यटकों की हत्या, घाटी में रोज़ाना जवानों की शहादत और सरहद पर लगातार गोलीबारी—ये सब ताज़ा उदाहरण हैं। ऐसे माहौल में पाकिस्तान से खेलना उसकी पीठ थपथपाने जैसा है। यह न सिर्फ खेल के नाम पर धोखा है बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उस देश को “सामान्य” बताने का मंच देना है, जिसे दुनिया पहले से आतंकवादी गतिविधियों का गढ़ मानती है। इतिहास गवाह है- 1990-91 के एशिया कप में पाकिस्तान ने भारत की मेज़बानी स्वीकार करने से इनकार कर दिया था। उसने कश्मीर नीति का हवाला देकर न सिर्फ टूर्नामेंट का बहिष्कार किया बल्कि भारत को दुनिया के सामने आतंकवादी देश घोषित करने पर आमादा हो गया था। पाकिस्तान की मंशा साफ थी- भारत को बदनाम करना और कश्मीर में हिंसा फैलाना। लेकिन आज विडंबना देखिए, वही भारत पाकिस्तान के सामने नतमस्तक हो गया है। उस वक्त का पाकिस्तान अगर भारत से खेलने को तैयार नहीं था, तो आज हम क्यों उसके दरवाज़े पर दोस्ती का पैगाम लेकर खड़े हैं? पहले मैच में भारत ने पाकिस्तान को बुरी तरह हराकर करोड़ों भारतीयों का सिर गर्व से ऊँचा किया। लेकिन सवाल ये है कि क्या जीत का यह क्षण शहीदों की बलिदानी गाथा से बड़ा है? क्या खेल में मिली खुशी, आतंक से उपजी त्रासदी पर भारी पड़ सकती है? “डबल इंजन सरकार” बार-बार राष्ट्रवाद और सुरक्षा का नारा देती है। लेकिन जब बारी पाकिस्तान के साथ खेल संबंध तोड़ने की आती है, तो वही सरकार चुप क्यों है? क्या सत्ता की राजनीति और अंतरराष्ट्रीय दबाव हमारी रीढ़ को इतना कमजोर कर चुके हैं कि हम दुश्मन के साथ हंसकर क्रिकेट खेलें? यह सच है कि खेल एक सेतु बन सकता है, लेकिन आतंकवाद के सामने कोई सेतु नहीं होता। पाकिस्तान अब भी हमारे खून से खेल रहा है। और हम क्रिकेट से। यह दृश्य अपमानजनक है।
“वो खेल में दोस्ती का सबक पढ़ाते हैं,
हम सरहद पर अपने लालों का खून बहाते हैं।”
आज भारत का हर नागरिक पूछ रहा है- जिन्होंने इस मैच को मंजूरी दी, क्या वे शहीदों के खून का मोल जानते हैं? क्या यह राष्ट्रहित से गद्दारी नहीं? भारत को तय करना होगा कि हमें दुश्मन से दोस्ती निभानी है या शहीदों की शहादत का मान रखना है।
Author: Pramod Gupta
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