भारत। विश्व बॉक्सिंग चैंपियनशिप 2025 में भारतीय बेटियों ने जो इतिहास रचा है, वह पूरे देश के लिए गर्व की बात है। मीनाक्षी हुड्डा का स्वर्ण, नूपुर श्योराण का रजत और पूजा रानी का कांस्य- यह सिर्फ पदक नहीं, बल्कि उन बेटियों का पसीना और संघर्ष है, जिन्होंने टूटी-फूटी जिम, पुराने दस्ताने और अधूरी सुविधाओं में भी अपने हौसले को बुलंद रखा। यह जीत उनकी मेहनत का फल है, न कि व्यवस्था की मेहरबानी। असलियत यह है कि भारत में खेलों की स्थिति अभी भी नारेबाज़ी और दिखावे तक सीमित है। सरकारें चुनावी मंच से “खेलो इंडिया” और “खेलो भविष्य” का वादा तो करती हैं, पर खिलाड़ियों की असलियत गांव-कस्बों के जर्जर मैदानों और धूल भरे रिंग में छिपी पड़ी रहती है। चीन जैसे देश से तुलना करें तो शर्म आती है। वहां खेल राष्ट्र की रणनीति है, खिलाड़ी सम्मान और सुरक्षा के साथ पाले जाते हैं। यहां हालात उलट हैं—जब कोई खिलाड़ी पदक जीत लाता है तो नेता फोटो खिंचवाने की होड़ में लग जाते हैं, पर तैयारी के समय वही खिलाड़ी स्पॉन्सर और आहार के लिए जूझता है। खेल नीति का आलम यह है कि बजट का बड़ा हिस्सा फाइलों और योजनाओं की घोषणाओं में ही खत्म हो जाता है। अकादमियों में उपकरण टूटे पड़े हैं, छोटे शहरों के खिलाड़ी बड़े शहरों तक पहुंचने से पहले ही हताश हो जाते हैं। भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद ने खेल संस्थानों को खोखला बना दिया है। नतीजा यह है कि हमारे खिलाड़ियों को अपनी प्रतिभा सिद्ध करने के लिए दोहरी लड़ाई लड़नी पड़ती है- एक मैदान में और दूसरी व्यवस्था के खिलाफ।जरूरत है कि सरकार सिर्फ घोषणा पत्रों में खेलों का जिक्र न करे, बल्कि खेलों को शिक्षा और रोज़गार से जोड़े। खिलाड़ियों को आर्थिक सुरक्षा, आधुनिक प्रशिक्षण, और वैज्ञानिक तकनीक उपलब्ध कराए। गांव-गांव में खेल अकादमियां खड़ी हों, ताकि प्रतिभा खोजने के लिए खिलाड़ियों को दिल्ली और बेंगलुरु का मुंह न ताकना पड़े।भारतीय मुक्केबाज़ बेटियों की यह जीत इस बात का सबूत है कि हौसला और जुनून सरकारी उपेक्षा से भी बड़ा होता है। लेकिन सवाल है कि कब तक हमारे खिलाड़ी केवल जज़्बे के सहारे अंतरराष्ट्रीय मंच पर लड़ते रहेंगे? कब हमारी सरकार यह समझेगी कि खेल सिर्फ मनोरंजन नहीं बल्कि राष्ट्रीय अस्मिता और अंतरराष्ट्रीय पहचान का मजबूत स्तंभ है? आज जरूरत है कि सरकार पदकों पर फूल बरसाने से पहले खिलाड़ियों को तैयारी के समय पसीने की इज्जत दे। खिलाड़ियों के संघर्ष को उनकी नियति न बनने दे, बल्कि उन्हें वही माहौल दे जो चीन, अमेरिका और यूरोप में सहज उपलब्ध है। तभी भारत सच में “खेल शक्ति” कहलाने का हकदार होगा। भारतीय बेटियों ने अपने मुक्कों से एक बार फिर यह साबित किया है कि वे किसी से कम नहीं। अब बारी सरकार की है- या तो वे इन हौसलों को व्यवस्था का सहारा दें, या फिर अगली जीत पर तालियां बजाकर चुप रह जाएं।
जिन्हें मिला है पसीने से मुक़ाम ऊँचा,
वो क्या जानें सियासत के वादों का सच्च।
Author: Pramod Gupta
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