सोनभद्र। ज़मीं तो रो पड़ी पत्थरों की सिसकियों से, इंसानियत की लौ बुझी हुक़्मरानों की खामोशियों से। सोनभद्र की ज़मीन, जहाँ खनिज सम्पदा के साथ-साथ इंसानों की भी साँसें बसती हैं, आज प्रदूषण और खतरनाक ब्लास्टिंग से कराह रही है। चोपन थाना क्षेत्र के ग्राम कोटा में बिना सूचना इलेक्ट्रॉनिक डेटोनेटर से की गई ब्लास्टिंग ने ग्रामीणों के बीच दहशत फैला दी। यह कोई एक दिन की दुर्घटना नहीं, बल्कि उस “सिस्टम” की निष्ठुरता का प्रमाण है जो जनता की सुरक्षा के बजाय केवल उद्योगपतियों और खनन माफ़िया की चमचमाती तिजोरियों के आगे नतमस्तक नज़र आता है। ग्रामीणों का दर्द स्पष्ट है- उन्हें न तो चेतावनी दी जाती है और न ही सुरक्षा मानक अपनाए जाते हैं। 20 फ़ीट गड्ढा खोदने की अनिवार्यता तक को ताक पर रख दिया जाता है। नतीजा यह कि खुले में धमाके होते हैं, पत्थरों के टुकड़े हवा में तैरते हैं और प्रदूषण गाँव-गाँव फैलकर मासूम बच्चों, बूढ़ों और गर्भवती औरतों की सेहत को धीरे-धीरे निगल रहा है। सवाल यह है कि आखिर क्यों ग्रामीणों को अपनी सेहत और जीवन की क़ीमत चुका कर इन अपराधों की भरपाई करनी पड़ रही है? प्रशासन की चुप्पी और शासन की उदासीनता इस त्रासदी की सबसे बड़ी गवाह है। आदेश काग़ज़ों तक सीमित रह जाते हैं, ज़मीन पर उनकी धज्जियाँ उड़ाई जाती हैं। काग़ज़ी नियमों और बैठकों की खानापूर्ति के बीच गाँव वाले धूल, प्रदूषण और धमाकों के शोर में दम तोड़ते रहते हैं। क्या यह वही सोनभद्र नहीं, जो जंगलों, नदियों और खनिज सम्पदा से परिपूर्ण था? आज यही धरती प्रदूषण से कराह रही है। प्रशासन की “कुम्भकर्णी नींद” कब टूटेगी? क्या हमारी व्यवस्था सचमुच गूंगी और बहरी हो चुकी है? अगर हाँ, तो फिर फ़ासिल्स और इस सिस्टम में क्या फर्क रह गया है? कहीं ऐसा तो नहीं कि हम आधुनिकता का दावा करते-करते पासाण युगीन संवेदनहीनता की ओर लौट रहे हैं, जहाँ इंसानियत का कोई मूल्य ही नहीं बचा। ज़रूरत है कि शासन-प्रशासन तुरंत संज्ञान ले और ऐसे कृत्यों पर कठोर रोक लगाए। वरना आने वाली पीढ़ियाँ हमें माफ़ नहीं करेंगी।
“ज़ालिम पत्थरों से डरते नहीं थे लोग,
आज इंसानों के चेहरे पत्थर हो गए हैं।”
Author: Pramod Gupta
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