सोनभद्र। ओबरा और बिल्लि-मारकुंडी खनन बेल्ट में एक बार फिर हलचल तेज़ है। डीजीएमएस द्वारा जारी आदेश में स्पष्ट था कि केवल सुधारात्मक कार्य की अनुमति है। तल में कार्य पूर्णतः वर्जित रहेगा। लेकिन ज़मीनी दावों के अनुसार कई स्थानों पर भारी ब्लास्टिंग देखी-सुनी जा रही है। यदि यह सत्य है, तो यह आदेश की सीधी अवहेलना है। पिछले हादसे की भयावहता अभी भी ताज़ा है। विस्फोट के बाद खदान धंस गई थी। मजदूरों के शव मलबे से निकाले गए थे। परिवारों की चीखें आज भी इलाके की हवा में गूंजती हैं। उस घटना ने सुरक्षा मानकों पर गंभीर सवाल खड़े किए थे।
प्रशासन ने कहा था- “अब सख्ती होगी।”
डीजीएमएस ने कहा- “सुधार के बिना खनन नहीं।”
अब यदि फिर से गतिविधियाँ तेज़ हैं, तो क्या यह सुधार है या जोखिम? खनन विशेषज्ञों के अनुसार, खदानों में हाई-वॉल स्थिरता, बेंचिंग की उचित चौड़ाई, नियंत्रित ब्लास्टिंग, और सेफ्टी ऑडिट अनिवार्य होते हैं। यदि इनमें कमी रही तो ढहने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। सवाल यह भी है कि क्या मजदूरों को हेलमेट, सेफ्टी शूज़, और प्रशिक्षण दिया जा रहा है? या वे फिर से बिना सुरक्षा के पत्थरों के बीच उतारे जा रहे हैं? जिला प्रशासन, खनन विभाग और श्रम विभाग को संयुक्त निरीक्षण कर वास्तविक स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
मजदूरों की जान कोई आंकड़ा नहीं। हर मौत एक परिवार को अंधेरे में धकेल देती है। यदि प्रतिबंध के बावजूद नियमों की धज्जियां उड़ रही हैं, तो यह सिर्फ अव्यवस्था नहीं, संभावित त्रासदी का संकेत है।
Author: Pramod Gupta
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