तीन महीने के अभियान में 47 अस्पतालों के अवैध संचालन का खुलासा, 70 को नोटिस, 30 सील और 17 के खिलाफ तहरीर का दावा; फिर भी प्रसूताओं की जान पर खतरा!
अस्पतालों के नाम बदलने और पंजीकरण नवीनीकरण के खेल पर उठे गंभीर सवाल, क्या कागजी कार्रवाई के बीच मरीजों की सुरक्षा हो रही नजरअंदाज?
सोनभद्र। जिले में स्वास्थ्य सेवाओं की निगरानी व्यवस्था पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। बगैर पंजीकरण, पंजीकरण निरस्त होने या नवीनीकरण के बिना संचालित होने के आरोपों से घिरे अस्पतालों के खिलाफ कार्रवाई आखिर इतनी धीमी क्यों है? क्या स्वास्थ्य विभाग को किसी अस्पताल में प्रसूता या नवजात की मौत होने के बाद ही कार्रवाई की याद आती है? यदि पहले से जांच, नोटिस, सीलिंग और प्राथमिकी के लिए तहरीर जैसी प्रक्रियाएं अपनाई जा चुकी हैं, तो फिर कथित अवैध अस्पतालों के संचालन पर प्रभावी रोक क्यों नहीं लग पा रही है? जिले में बीते पांच माह के भीतर प्रसव से जुड़ी तीन घटनाएं सामने आने का दावा किया गया है, जिनमें प्रसूताओं की मौत के बाद अस्पतालों की वैधानिक स्थिति और स्वास्थ्य विभाग की निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठे। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि अस्पतालों की जांच और कार्रवाई को लेकर गंभीरता अक्सर घटना के बाद ही चर्चा में आती है। ऐसे में सवाल केवल किसी एक अस्पताल का नहीं, बल्कि पूरे जिले की निगरानी व्यवस्था का है।
तीन महीने के अभियान में 47 अस्पतालों का मामला सामने आया था
पूर्व मुख्य चिकित्सा अधिकारी के कार्यकाल में चलाए गए विशेष जांच अभियान के दौरान तीन माह में 47 अस्पतालों के अवैध संचालन का मामला सामने आने की बात कही गई थी। अभियान के तहत खामियां मिलने पर 70 अस्पतालों को नोटिस जारी करने, 30 अस्पतालों को सील करने और 17 के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराने के लिए तहरीर देने का दावा किया गया था। यदि ये कार्रवाई वास्तव में की गई थी, तो अब यह जानना जरूरी है कि सील किए गए अस्पतालों की वर्तमान स्थिति क्या है? कितने अस्पतालों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज हुई? कितनों ने निर्धारित मानकों और पंजीकरण संबंधी कमियों को दूर किया? और कितने प्रतिष्ठान अब भी नियमों को ताक पर रखकर संचालित हो रहे हैं? इन सवालों के जवाब सार्वजनिक होना जरूरी है, ताकि कार्रवाई की वास्तविक स्थिति सामने आ सके।
प्रसूता की मौत के बाद ही सामने क्यों आती है अस्पताल की हकीकत?
30 मई को कोन स्थित ग्लोबल हॉस्पिटल में प्रसव के लिए लाई गई आशा कार्यकर्ता की मौत का मामला सामने आया था। उस समय स्वास्थ्य विभाग की ओर से अस्पताल को पूर्व में तीन बार सील किए जाने की बात कही गई थी। इसके बावजूद प्राथमिकी दर्ज होने की कार्रवाई प्रसूता की मौत के बाद होने की जानकारी सामने आई। यह मामला निगरानी व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल खड़ा करता है। यदि किसी अस्पताल को पहले ही सील किया जा चुका था, तो उसके दोबारा संचालित होने की स्थिति में समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं हुई? यदि अस्पताल बंद था, तो वहां प्रसव के लिए मरीज कैसे पहुंची? और यदि सीलिंग के आदेश का उल्लंघन हुआ, तो संबंधित जिम्मेदारों के खिलाफ क्या कदम उठाए गए? इन सवालों का जवाब जांच और आधिकारिक अभिलेखों से ही सामने आना चाहिए। किसी भी अस्पताल की लापरवाही या मौत के लिए जिम्मेदारी तय करना जांच का विषय है, लेकिन पहले से मिली शिकायतों पर कार्रवाई में देरी की जांच भी उतनी ही जरूरी है।
अस्पतालों के नाम बदलने का मामला क्या है? जांच की उठी मांग
इस पूरे प्रकरण में कुछ अस्पतालों के नाम बदलने और पंजीकरण के नवीनीकरण को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। उपलब्ध कराई गई जानकारी और सूत्रों के दावों के अनुसार सोनगंगा का नाम बदलकर एसजी हॉस्पिटल, जनता सेवा का नाम बदलकर जेएस हॉस्पिटल, परमहंस का नाम बदलकर यथार्थ हॉस्पिटल, जन सहायता का नाम बदलकर न्यू जन सहायता, प्रेरणा हॉस्पिटल का नाम बदलकर संजीवनी हॉस्पिटल तथा ओम हॉस्पिटल का नाम बदलकर न्यू ओम हॉस्पिटल किए जाने की बात कही गई है। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित पंजीकरण अभिलेखों की जांच आवश्यक है। केवल नाम बदलने से किसी अस्पताल का पंजीकरण स्वतः वैध या अवैध नहीं माना जा सकता। असली सवाल यह है कि क्या प्रत्येक प्रतिष्ठान का पंजीकरण नियमानुसार हुआ, क्या नवीनीकरण की प्रक्रिया पूरी की गई, क्या संचालक और परिसर का विवरण अभिलेखों से मेल खाता है और क्या संबंधित अस्पताल निर्धारित चिकित्सकीय मानकों का पालन कर रहे हैं? यदि नाम परिवर्तन की आड़ में पुराने पंजीकरण की कमियों को छिपाकर संचालन जारी रखने का मामला सामने आता है, तो इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। वहीं, यदि नाम परिवर्तन नियमानुसार हुआ है, तो अभिलेखों के आधार पर स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए। बिना सत्यापन किसी भी अस्पताल या अधिकारी को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा।
18 अस्पतालों की सूची चर्चा में, कार्रवाई का इंतजार
पिछले महीने स्वास्थ्य विभाग की ओर से 18 अस्पतालों के कथित अवैध संचालन से संबंधित सूची पुलिस अधीक्षक को भेजे जाने की जानकारी सामने आई थी। इनमें पंजीकरण निरस्त होने अथवा नवीनीकरण नहीं होने जैसे मामले शामिल बताए गए थे। इसके बावजूद कार्रवाई की स्थिति को लेकर सवाल बने हुए हैं। क्या इन सभी अस्पतालों का दोबारा निरीक्षण किया गया? क्या वर्तमान पंजीकरण की स्थिति की पुष्टि हुई? कितने अस्पतालों को बंद कराया गया और कितनों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की गई? यदि जांच रिपोर्ट उपलब्ध है, तो उसकी प्रगति और कार्रवाई का विवरण सार्वजनिक क्यों नहीं किया जाता? सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या मरीजों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पहले से चिह्नित प्रतिष्ठानों पर कार्रवाई करने के लिए किसी बड़ी घटना का इंतजार किया जाएगा?
स्वास्थ्य विभाग की जवाबदेही भी हो तय
जिले में अस्पतालों के संचालन की वैधानिक स्थिति की जांच करना और निर्धारित मानकों का पालन सुनिश्चित कराना स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी है। ऐसे में केवल नोटिस जारी करना, सूची भेजना या अभियान चलाने का दावा करना पर्याप्त नहीं है। कार्रवाई का वास्तविक परिणाम अस्पतालों की वर्तमान स्थिति, पंजीकरण की वैधता, चिकित्सकों की उपलब्धता और मरीजों को मिल रही सेवाओं से स्पष्ट होना चाहिए। यदि किसी अस्पताल को सील करने के बाद भी संचालन की अनुमति के बिना काम करने दिया गया, यदि पंजीकरण संबंधी गंभीर कमियों के बावजूद मरीजों का इलाज जारी रहा या यदि अधिकारियों की लापरवाही सामने आती है, तो संबंधित जिम्मेदारी तय करने के लिए निष्पक्ष जांच जरूरी है।
जिलाधिकारी से गोपनीय और निष्पक्ष जांच की मांग
नगरवासियों ने जिलाधिकारी चर्चित गौड़ से पूरे मामले की गोपनीय, निष्पक्ष और समयबद्ध जांच कराने की मांग की है। मांग है कि जिले के सभी संदिग्ध अस्पतालों के पंजीकरण, नवीनीकरण, नाम परिवर्तन, सीलिंग की कार्रवाई और प्राथमिकी संबंधी अभिलेखों का मिलान कराया जाए। यह भी जांच हो कि जिन अस्पतालों के खिलाफ पहले कार्रवाई की गई थी, वे वर्तमान में किस स्थिति में हैं और कहीं नियमों का उल्लंघन कर दोबारा संचालन तो नहीं किया जा रहा है।साथ ही, जांच में दोषी पाए जाने वाले अस्पताल संचालकों और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ नियमानुसार कड़ी कार्रवाई की जाए। मरीजों की सुरक्षा से जुड़े मामलों में किसी भी स्तर पर लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जानी चाहिए। अब सवाल साफ है—जब पहले से अस्पतालों की सूची मौजूद है, जांच अभियान चल चुका है और सीलिंग तथा नोटिस की कार्रवाई का दावा भी किया जा चुका है, तो फिर निगरानी व्यवस्था की असली परीक्षा घटनाओं के बाद ही क्यों होती है? सोनभद्र के लोगों को आश्वासन नहीं, बल्कि पारदर्शी जांच, जवाबदेही और धरातल पर दिखाई देने वाली कार्रवाई चाहिए।
Author: Pramod Gupta
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