– घरों और मंदिरों में होगी पूजा-अर्चना, जीमूतवाहन की कथा सुनकर महिलाएं करेंगी संतान की मंगलकामना
सोनभद्र। आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाने वाला जीवित्पुत्रिका व्रत शनिवार को श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाएगा। इसे जितिया या जीवित्पुत्रिका व्रत के नाम से भी जाना जाता है। संतान की दीर्घायु, सुख-समृद्धि और स्वस्थ जीवन की कामना को लेकर महिलाएं इस व्रत को रखती हैं। स्त्री समाज में इस पर्व का विशेष धार्मिक और पारंपरिक महत्व माना जाता है।जीवित्पुत्रिका व्रत को लेकर जिलेभर में महिलाओं ने शुक्रवार से ही तैयारियां शुरू कर दी थीं। शनिवार को व्रती महिलाएं निर्धारित विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना करेंगी और अपने पुत्रों की लंबी आयु तथा सुखी जीवन के लिए मंगलकामना करेंगी। इस अवसर पर घरों के साथ-साथ विभिन्न मंदिरों में भी विशेष पूजन-अर्चन किए जाने की परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जीवित्पुत्रिका व्रत का संबंध गंधर्व राजकुमार जीमूतवाहन से जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि जीमूतवाहन अत्यंत उदार, परोपकारी और दयालु थे। उनका विवाह मलयवती नामक राजकन्या से हुआ था। एक दिन वन में भ्रमण करते हुए जीमूतवाहन काफी आगे निकल गए। इसी दौरान उन्हें एक वृद्धा महिला विलाप करती हुई दिखाई दी। जीमूतवाहन ने वृद्धा से उसके दुख का कारण पूछा। वृद्धा ने बताया कि वह नागवंश की स्त्री है और उसका एकमात्र पुत्र शंखचूड़ है। नागों ने पक्षीराज गरुड़ के समक्ष प्रतिदिन एक नाग को उनके भोजन के लिए प्रस्तुत करने की प्रतिज्ञा की थी। उस दिन उसके पुत्र शंखचूड़ की बलि देने की बारी थी। पुत्र की मृत्यु की आशंका से वृद्धा विलाप कर रही थी। वृद्धा की पीड़ा सुनकर जीमूतवाहन ने उसे सांत्वना देते हुए आश्वस्त किया कि वह उसके पुत्र के प्राणों की रक्षा करेंगे। इसके बाद उन्होंने स्वयं शंखचूड़ के स्थान पर गरुड़ को अपना शरीर अर्पित करने का निर्णय लिया। बताया जाता है कि जीमूतवाहन ने शंखचूड़ से लाल कपड़ा लिया और उसे अपने शरीर पर लपेटकर बलि के लिए तैयार हो गए। कुछ समय बाद पक्षीराज गरुड़ वहां पहुंचे और लाल कपड़े में ढंके जीमूतवाहन को अपने पंजों में दबोचकर पहाड़ पर ले गए। अपने चंगुल में फंसे जीव को शांत देखकर गरुड़ को आश्चर्य हुआ। उन्होंने जीमूतवाहन से उनका परिचय पूछा। तब जीमूतवाहन ने पूरी घटना और वृद्धा के पुत्र को बचाने के लिए स्वयं को बलिदान के लिए प्रस्तुत करने की बात बताई। जीमूतवाहन के अदम्य साहस, परोपकार और दूसरे के प्राणों की रक्षा के लिए स्वयं का जीवन दांव पर लगाने की भावना से गरुड़ अत्यंत प्रभावित हुए। उनकी इस त्याग भावना से प्रसन्न होकर गरुड़ ने जीमूतवाहन को जीवनदान दिया। साथ ही नागों की बलि न लेने का वरदान भी दिया। धार्मिक मान्यता के अनुसार इसी प्रसंग से जीवित्पुत्रिका व्रत की परंपरा जुड़ी मानी जाती है। पुत्र की दीर्घायु और रक्षा की कामना से माताओं द्वारा इस व्रत को रखने की परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है। शनिवार को व्रती महिलाएं दिनभर व्रत रखकर शाम को विधि-विधान से पूजन करेंगी। कई स्थानों पर महिलाएं सामूहिक रूप से एकत्र होकर जीवित्पुत्रिका व्रत की कथा का श्रवण भी करेंगी। पूजा के दौरान जीमूतवाहन का स्मरण कर पुत्रों के दीर्घायु, आरोग्य और सुख-समृद्धि की कामना की जाएगी।पर्व को लेकर महिलाओं में विशेष उत्साह देखा जा रहा है। बाजारों में भी पूजन सामग्री, फल, मिठाई और अन्य आवश्यक सामानों की खरीदारी को लेकर चहल-पहल बनी हुई है। घरों में व्रत से संबंधित तैयारियां पूरी की जा रही हैं। मान्यता और आस्था से जुड़े इस पर्व को लेकर सोनभद्र के विभिन्न क्षेत्रों में शनिवार को धार्मिक वातावरण देखने को मिलेगा।
Author: Pramod Gupta
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