सोनभद्र। जिले में भ्रष्टाचार की जड़ में मट्ठा डालने वाली बड़ी कार्रवाई सामने आई है। स्वच्छ भारत मिशन के नाम पर गाँवों में शौचालयों की आंधी दिखाई गई, लेकिन धरातल पर कहीं हवा तक नहीं चली। ऐसा लगता है मानो पूरे सोनभद्र में एक भी पंचायत नहीं जहां लक्ष्य के अनुरूप शौचालयों का निर्माण पूरा हुआ हो।
सब कागज़ पर गुलाबी-सब उजाला, लेकिन असलियत में काला अंधेरा।
इसी अंधेरे को चीरते हुए ग्राम पंचायत दुसर में हुए खुलासे ने प्रशासनिक गलियारों में भूचाल ला दिया है। यहां 139 शौचालयों का निर्माण कागज़ पर पूरा दिखाया गया, पर वास्तविक जांच में मिले केवल 35। बाकी?-काग़ज़ी निर्माण, फर्जी बिल, और सरकारी धन की लूट का नंगा नाच।जिलाधिकारी की जांच रिपोर्ट ने इसे साफ़-साफ़ वित्तीय दुरुपयोग और भ्रष्टाचार के रूप में चिन्हित किया। सचिव रघुनन्दन गौतम ने ग्राम प्रधान के साथ मिलकर सरकारी धन का ऐसा “शौचालय महाघोटाला” रचा कि पूरा गांव बदबू से भर गया।
नोटिस भेजे गए, पर जवाब सिर्फ खामोशी में मिला।
जिलाधिकारी ने विद्रोही तेवर में आदेश दिया—
“₹24,77,800 की सरकारी धनराशि तत्काल वसूल की जाए और साथ ही ₹1,23,591 ब्याज भी जमा कराया जाए। 10 दिनों में भुगतान न हुआ तो कड़ी कार्रवाई तय।”
यह सिर्फ एक पंचायत की कहानी नहीं है—
यह पूरे जिले के उन फर्जी दावों का आईना है जिन्हें देखकर लगता है जैसे सभी गाँवों का मौसम गुलाबी है।
काग़ज़ों पर फूल खिले हैं, रिपोर्टें महक रही हैं, और अधिकारी कह रहे हैं—“सब ठीक है।”
लेकिन जमीन पर सच जल रहा है।
लोग पूछ रहे हैं—
“शौचालय कहाँ हैं? पैसा कहाँ है? विकास कहाँ है?”
सोनभद्र के हर पंचायत में यही सवाल, यही दर्द और यही विद्रोह गूंज रहा है।
यह कार्रवाई भ्रष्टाचार की केवल पहली ईंट है,
दीवार अभी बाक़ी है।
और जनता इंतज़ार में है कि अगली दरार किस पंचायत की दीवार में पड़ती है।
Author: Pramod Gupta
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