बरेली (समर सैम) बरेली में हालिया उपद्रव की गहन जांच अब विशेष जांच दल (एसआईटी) के हवाले कर दी गई है। एसपी सिटी के निर्देशन में गठित इस दल में तीन सीओ, चौदह इंस्पेक्टर, मुकदमों के सभी विवेचक, साथ ही एसओजी और सर्विलांस प्रभारी भी शामिल हैं। दस एफआईआर दर्ज की जा चुकी हैं और एसआईटी को निर्देश दिया गया है कि एक माह के भीतर विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करे। यह पहल निश्चित ही स्वागत योग्य है, क्योंकि निष्पक्ष और पारदर्शी जांच के बिना उपद्रव के असली कारणों, जिम्मेदार व्यक्तियों और प्रशासनिक लापरवाही की तह तक पहुँचना संभव नहीं। बरेली उपद्रव यह सवाल उठाता है कि क्या शांतिपूर्ण प्रदर्शन, जो लोकतंत्र का संवैधानिक अधिकार है, इतनी आसानी से हिंसा में बदल सकता है? या इसके पीछे कोई योजनाबद्ध साजिश और प्रशासनिक चूक रही? “ई लव मोहम्मद” जैसे भावनात्मक नारे और शांतिपूर्ण प्रदर्शन अचानक हिंसक घटनाओं में कैसे बदल गए, इस पर जांच जरूरी है। इससे न केवल वास्तविक दोषियों का पता चलेगा, बल्कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने की राह भी खुलेगी। वहीं, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा दिया गया बयान विवादास्पद और लोकतांत्रिक गरिमा के विपरीत माना जा रहा है। किसी सभ्य लोकतांत्रिक देश के मुख्यमंत्री से अपेक्षा की जाती है कि वे शांति, संवाद और सद्भाव का संदेश दें, न कि नफरत फैलाने वाले आदेश। ऐसे बयान समाज में विभाजन और तनाव को बढ़ाते हैं और शासन की विश्वसनीयता पर भी प्रश्न चिन्ह लगाते हैं। आज जरूरत इस बात की है कि जांच निष्पक्ष, तटस्थ और पारदर्शी हो। दोषी चाहे किसी भी वर्ग, संगठन या प्रशासनिक तंत्र से जुड़े हों, उन्हें कानून के कठघरे में लाना ही न्याय होगा। राजनीतिक नेतृत्व को भी यह समझना होगा कि सत्ता का उद्देश्य जनता के बीच शांति, न्याय और विकास सुनिश्चित करना है, न कि विवाद और तनाव बढ़ाना। बरेली उपद्रव केवल एक जिले की समस्या नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए एक सबक है कि असहमति और विरोध को संभालने का सही तरीका अपनाया जाए। यदि सरकार और समाज मिलकर संवाद, सहिष्णुता और कानून के प्रति विश्वास बनाए रखें, तो भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सकती है।
Author: Pramod Gupta
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