प्रयागराज (समर सैम) इलाहाबाद हाईकोर्ट का हालिया आदेश उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (यूपीपीएससी) के कामकाज पर गहरे सवाल खड़ा करता है। कोर्ट ने यूपी पीसीएस की मुख्य परीक्षा पर रोक लगाते हुए आयोग को निर्देश दिया है कि वह प्रारंभिक परीक्षा की मेरिट सूची पुनः तैयार करे। कारण यह है कि आयोग ने आरक्षित वर्ग के योग्य उम्मीदवारों को अनारक्षित सूची में शामिल नहीं किया, जो कि न केवल आरक्षण नीति के सिद्धांतों के विपरीत है, बल्कि योग्य अभ्यर्थियों के अधिकारों का हनन भी है। भारत का संविधान समान अवसर और सामाजिक न्याय की गारंटी देता है। आरक्षण का उद्देश्य पिछड़े और वंचित वर्गों को मुख्यधारा में लाना है। लेकिन आरक्षण का अर्थ यह हरगिज़ नहीं है कि आरक्षित वर्ग का कोई योग्य अभ्यर्थी यदि सामान्य (अनारक्षित) श्रेणी की मेरिट में स्थान पा ले तो उसे वहां से वंचित कर दिया जाए। सर्वोच्च न्यायालय ने कई बार स्पष्ट किया है कि यदि आरक्षित वर्ग का उम्मीदवार सामान्य वर्ग की मेरिट पर आता है तो उसे अनारक्षित श्रेणी में गिना जाएगा। यह प्रावधान इसलिए है ताकि उसकी योग्यता को मान्यता मिले और अन्य अभ्यर्थियों के लिए भी आरक्षित सीटें सुरक्षित रहें। यूपीपीएससी द्वारा इस स्थापित नियम की अनदेखी न केवल लापरवाही दर्शाती है, बल्कि यह अभ्यर्थियों के भविष्य के साथ खिलवाड़ भी है। प्रतियोगी परीक्षाओं में मेहनत और परिश्रम के वर्षों बाद यदि ऐसी त्रुटियाँ सामने आएँ, तो यह व्यवस्था पर से भरोसा डगमगा देती हैं। योग्य उम्मीदवारों के साथ न्याय करना किसी भी परीक्षा प्रणाली का मूल आधार होना चाहिए। हाईकोर्ट का यह फैसला न्यायिक सक्रियता का उत्कृष्ट उदाहरण है। इस आदेश से न केवल प्रभावित अभ्यर्थियों को राहत मिलेगी बल्कि आयोग को भी अपनी कार्यप्रणाली में पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करनी होगी। यह घटना प्रशासनिक संस्थाओं को यह याद दिलाती है कि कानून और न्याय के स्थापित मानकों से किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ अस्वीकार्य है। आवश्यक है कि यूपीपीएससी इस प्रकरण से सबक ले और भविष्य में ऐसी चूक न हो। अभ्यर्थियों का विश्वास बनाए रखने के लिए आयोग को चाहिए कि वह चयन प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, त्वरित और संवेदनशील बनाए। आखिरकार, प्रतियोगी परीक्षाएँ केवल नौकरियों का माध्यम नहीं होतीं, बल्कि लाखों युवाओं के सपनों और उम्मीदों का दर्पण भी होती हैं।
Author: Pramod Gupta
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