प्रयागराज (समर सैम) इलाहाबाद के नवाबगंज थाने में हुई हिरासत में मौत ने उत्तर प्रदेश की कानून-व्यवस्था पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। अधिवक्ता मंच के मोहम्मद सईद और प्रमोद कुमार गुप्ता द्वारा दाखिल जनहित याचिका की सुनवाई आज जस्टिस सिद्धार्थ की अदालत में होनी है। इस बहस में वरिष्ठ अधिवक्ता राजवेंद्र सिंह और चार्ली प्रकाश भी शामिल होंगे। मामले के अनुसार, 26 मई 2025 को नारे पार बढ़ौना गांव के 40 वर्षीय दलित मजदूर को चोरी के एक मामले में पुलिस ने घर से उठाया। थर्ड डिग्री यातना दी गई और उसकी मौत हो गई। परिजनों को न तो शव देखने दिया गया, न ही पोस्टमार्टम रिपोर्ट। पुलिस ने शव अपने कब्जे में रखते हुए दारागंज में जला दिया।
बेलगाम होती पुलिस
योगी सरकार सुशासन और अपराधियों पर कठोर कार्रवाई के दावे करती है, मगर थानों में इंसाफ की जगह अगर जुल्म का राज कायम हो जाए, तो लोकतंत्र की आत्मा पर सीधा आघात होता है। बुलडोज़र राजनीति अपराधियों पर अंकुश लगाने का प्रतीक बताई जाती है, लेकिन पुलिस का बेलगाम रवैया जनता के लिए भय का कारण बन रहा है।
क्या पुलिस अपराधी बन रही है?
जब हिरासत में मौतें सामान्य घटना बनने लगें और पीड़ित परिवार को न्याय की जगह खामोशी दी जाए, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है- क्या पुलिस का अपराधीकरण हो रहा है? थर्ड डिग्री, यातना और शव को परिवार से छिपाकर जलाना, यह सब उस पुलिस की करतूत है जो संविधान की शपथ लेकर जनता की सुरक्षा के लिए खड़ी की गई थी।
दलित समाज पर सबसे बड़ा प्रहार
यह मामला विशेष रूप से दलित समाज के लिए गंभीर है। आज़ादी के 75 साल बाद भी दलित सबसे अधिक पुलिसिया ज्यादतियों का शिकार होते हैं। मानवाधिकार और संवैधानिक अधिकार उनके लिए सिर्फ काग़ज़ी साबित हो रहे हैं। लोकतंत्र की जड़ें तब तक मज़बूत नहीं हो सकतीं, जब तक दलित समाज को समान न्याय और सम्मान न मिले।
नागरिक समाज की भूमिका
अधिवक्ता मंच द्वारा दाखिल जनहित याचिका इस बात का प्रमाण है कि नागरिक समाज अभी भी ज़िम्मेदारी निभा रहा है। यदि ऐसी आवाज़ें अदालत तक न पहुँचें, तो सत्ता और तंत्र का संतुलन पूरी तरह बिगड़ जाएगा।
शेर की चेतावनी
“पैदा हुई पुलिस तो इब्लीस ने कहा,
खुदा ने मुझको साहिबे औलाद कर दिया।”
यह शेर आज के हालात पर सटीक बैठता है। पुलिस, जो अपराध रोकने के लिए बनी थी, यदि खुद अपराध का औज़ार बन जाए, तो यह लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है।
न्यायपालिका की कसौटी
अब यह अदालत की ज़िम्मेदारी है कि वह सख्त रुख अपनाए और यह संदेश दे कि कोई भी पुलिसकर्मी या सत्ता कानून से ऊपर नहीं है। लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब सबसे कमजोर और हाशिए पर खड़े नागरिक की आवाज़ भी सुनी जाएगी।
Author: Pramod Gupta
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