क्या मिलना , वैसे लोगो से ।
जिनके चंद रुपयों में, ईमान बिक गये।।
उनसे पूछिए , जिंदगी क्या है जनाब।
जिनके सब ,अरमान बिक गये।।
नग्न हो गई , जीवित लाशें।
मुर्दों के , परिधान बिक गए।।
चोरों को , दोष क्यों देना।
घर के जब पहरेदार बिक गए।।
सोच समझकर , मुंह से बोले ।
दीवारों के , कान बिक गए।।
तन भी बिका, मन भी बिका।
बिकने वाले , भरे बाजार बिक गए।।
हिंदी है माथे की बिंदी न जाने कहा खो गई।
अंग्रेजी पढ़ने के चक्कर मे संस्कारों को धो गई।।
हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।
Author: Pramod Gupta
Hello
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