सोनभद्र। ओबरा–बिल्लि-मारकुंडी की पहाड़ियाँ फिर कांप रही हैं। सवाल ये है—जब कागज़ पर ताला जड़ा है, तो ज़मीन पर बारूद कौन फोड़ रहा है? जिस खनन बेल्ट पर Directorate General of Mines Safety (डीजीएमएस) ने Mines Act, 1952 की धारा 22(3) के तहत सख्त रोक लगाई, वहाँ फिर मशीनें गरज रही हैं, ड्रिल चीख रही है और ब्लास्टिंग की गूंज आसमान चीर रही है।
कानून कहता है—“सुधार करो”
ज़मीन कहती है—“उत्पादन जारी है”
सुधार या सुनियोजित खेल?
आदेश साफ था—
खदान के तल पर काम नहीं।
सिर्फ PINK मार्क किए क्षेत्र में सीमित Rectification।
90 दिन में सुरक्षा सुधार की रिपोर्ट।
लेकिन अगर “सुधार” की आड़ में पत्थर निकल रहे हों, ट्रक भर-भरकर बोल्डर दौड़ रहे हों और रात के सन्नाटे में धमाके गूंज रहे हों—तो यह सुधार नहीं, सिस्टम के मुंह पर तमाचा है।
हादसों की राख अभी ठंडी नहीं हुई
याद है वो दिन, जब विस्फोट ने 8–10 मजदूरों की सांसें छीन ली थीं?
खदान धंसी थी, घरों में चूल्हे बुझ गए थे, मातम पसरा था। घोषणाएँ हुईं, सख्ती के दावे हुए, जांच की बातें हुईं।
और आज?
अगर वही इलाका फिर बारूद से दहक रहा है, तो यह महज़ लापरवाही नहीं—यह ज़िम्मेदारी से बगावत है।
जिम्मेदारी का पिंग-पोंग
डीजीएमएस का कहना—आदेश की प्रति जिला प्रशासन और खान विभाग को दी गई।
स्थानीय अफसरों का कथित जवाब—हादसा होगा तो जिम्मेदारी डीजीएमएस की!
आखिर ये खेल किसका है?
जब मजदूर खदान में उतरता है, उसे ये नहीं बताया जाता कि उसकी जान किस विभाग के खाते में दर्ज होगी।
अगर ब्लास्टिंग जारी है, तो कौन देख रहा है?
अगर अवैध परिवहन धड़ल्ले से है, तो किसकी आंखों पर पट्टी बंधी है?
अगर 90 दिन में सुधार हुआ, तो रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं?
सवाल जो लखनऊ तक गूंजेंगे
क्या संयुक्त निरीक्षण हुआ?
क्या ड्रोन सर्वे कराया गया?
क्या सुरक्षा ऑडिट स्वतंत्र एजेंसी से हुआ?
क्या मजदूरों को हेलमेट, हार्नेस, प्रशिक्षण मिला?
या फिर काली कमाई की चकाचौंध में नियमों को नीलाम कर दिया गया?
मजदूर की जान बनाम मुनाफे की भूख
खनन से राजस्व आता है, विकास होता है—यह सच है।
लेकिन अगर हाई-वॉल अस्थिर है, बेंचिंग मानक से बाहर है और फिर भी बारूद फोड़ा जा रहा है, तो यह विकास नहीं—मौत को दावत है।
मजदूर रोज़ी के लिए उतरता है, शहादत के लिए नहीं।
अगर प्रतिबंध के बावजूद खनन “युद्ध स्तर” पर है, तो यह सिर्फ नियमों का उल्लंघन नहीं—यह मानवता के खिलाफ अपराध है।
अब चुप्पी नहीं चलेगी
ओबरा–बिल्लि-मारकुंडी की गूंज अब पहाड़ों तक सीमित नहीं रहेगी।
यह आवाज़ लखनऊ की दहलीज तक जाएगी।
हम मांग करते हैं—
आदेश की हर शर्त का सार्वजनिक खुलासा हो।
निरीक्षण रिपोर्ट और ड्रोन फुटेज जारी हों।
अवैध खनन और परिवहन पर तत्काल कार्रवाई हो।
जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय हो।
हर धमाका अब सिर्फ पत्थर नहीं तोड़ रहा—
वह भरोसा तोड़ रहा है।
अगर सिस्टम जागा नहीं, तो यह गूंज एक दिन सियासी भूचाल में बदलेगी।
सोनभद्र की धरती विकास चाहती है—लेकिन मजदूरों के खून की कीमत पर नहीं।
Author: Pramod Gupta
Hello









