सोनभद्र। खनिज संपदा से समृद्ध क्षेत्रों में खनन गतिविधियां विकास का आधार मानी जाती हैं, लेकिन जब नियमों की अनदेखी और पारदर्शिता पर सवाल उठने लगें, तो वही खनन विवाद का कारण भी बन जाता है। हाल के दिनों में खनन क्षेत्रों को लेकर उठ रही चर्चाओं ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं—क्या सब कुछ नियमों के अनुरूप हो रहा है, या कहीं परमिट और वास्तविक खनन के बीच कोई बड़ा अंतर छिपा हुआ है? मामला मे./पार्टनर अकबर अली पुत्र मजनू भाई, आरजी संख्या 941ख, बर्दिया स्थित खदान से जुड़ा बताया जा रहा है। हालांकि, अब तक इन आरोपों की किसी सक्षम प्राधिकारी द्वारा आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। प्रशासनिक स्तर पर सत्यापन, अभिलेखों का मिलान और स्थलीय निरीक्षण के बाद ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी। जब तक जांच रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं होती, तब तक इस प्रकरण को आरोप और जांच के दायरे में ही माना जा रहा है।
परमिट बनाम वास्तविकता
स्थानीय स्तर पर यह आरोप चर्चा में हैं कि खनन परमिट की आड़ में वास्तविक उत्खनन की मात्रा और स्थान में अंतर हो सकता है। यदि परमिट एक क्षेत्र के नाम पर जारी हो और उपयोग किसी अन्य क्षेत्र में किया जा रहा हो, तो यह न केवल नियमों का उल्लंघन है बल्कि राजस्व और प्रशासनिक व्यवस्था दोनों पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
ऐसे मामलों में डिजिटल सत्यापन, जीपीएस आधारित निगरानी और रिकॉर्ड मिलान बेहद आवश्यक माने जाते हैं।
सुरक्षा पर गहराते सवाल
खनन केवल उत्पादन का विषय नहीं, बल्कि मानव जीवन की सुरक्षा से भी सीधे जुड़ा है।
- क्या बेंचिंग (सीढ़ीनुमा कटान) के मानकों का पालन हो रहा है?
- क्या ब्लास्टिंग से पहले सुरक्षा घेरा और चेतावनी प्रक्रिया अपनाई जाती है?
- क्या मजदूरों को हेलमेट, मास्क और अन्य सुरक्षा उपकरण उपलब्ध कराए जाते हैं?
विशेषज्ञों के अनुसार असुरक्षित और अवैज्ञानिक खनन से धंसान, दुर्घटनाएं और गंभीर जान-माल का खतरा बढ़ जाता है। कई स्थानों पर ब्लास्टिंग के दौरान धूल, कंपन और शोर को लेकर ग्रामीणों की शिकायतें भी सामने आती रही हैं, जो पर्यावरण और स्वास्थ्य दोनों के लिए चिंताजनक संकेत हैं।
पर्यावरणीय प्रभाव भी चिंता का विषय
अनियंत्रित खनन से धूल प्रदूषण, भू-क्षरण, जलस्रोतों पर प्रभाव और पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ने का खतरा रहता है। नियमों के अनुसार खनन क्षेत्रों में नियमित मॉनिटरिंग, पर्यावरण प्रबंधन योजना और पुनर्वनीकरण जैसे उपाय अनिवार्य होते हैं। सवाल यह है कि क्या इन प्रावधानों का पालन जमीनी स्तर पर सुनिश्चित किया जा रहा है?
प्रशासन की भूमिका पर निगाह
जब आरोप बढ़ते हैं और जवाब कम मिलते हैं, तब पारदर्शिता की मांग स्वाभाविक हो जाती है।
- क्या विभागीय निरीक्षण नियमित हो रहे हैं?
- क्या लीज सीमा का तकनीकी सत्यापन कराया गया है?
- क्या निरीक्षण रिपोर्ट सार्वजनिक की जाएगी?
- क्या सुरक्षा ऑडिट समय-समय पर हो रहा है?
जन अपेक्षा: जांच और पारदर्शिता
स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों की प्रमुख मांग है कि संयुक्त टीम द्वारा स्थलीय निरीक्षण, ड्रोन सर्वे, परमिट रिकॉर्ड का सार्वजनिक मिलान और सुरक्षा मानकों की स्वतंत्र जांच कराई जाए, ताकि तथ्य स्पष्ट हो सकें और किसी भी तरह की अनियमितता पर प्रभावी कार्रवाई हो। खनिज संपदा किसी भी क्षेत्र की आर्थिक ताकत होती है, लेकिन नियमों, सुरक्षा और पर्यावरणीय संतुलन की अनदेखी विकास को जोखिम में डाल सकती है।
सवाल अभी भी कायम हैं—क्या जांच होगी, और क्या सच्चाई सामने आएगी?
Author: Pramod Gupta
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