सोनभद्र। सामाजिक कार्यकर्ता राकेश केशरी ने उत्तर प्रदेश सरकार से मांग की है कि जब तक किसी व्यक्ति को न्यायालय द्वारा दोषी सिद्ध न किया जाए, तब तक उसे चरित्र प्रमाण पत्र देने से वंचित न किया जाए। उन्होंने कहा कि मुकदमा दर्ज होना मात्र किसी के अपराधी होने का प्रमाण नहीं होता। पहले चरित्र प्रमाण पत्र की आवश्यकता केवल सरकारी नौकरियों में होती थी, लेकिन अब प्राइवेट सेक्टर में भी पुलिस वेरिफिकेशन अनिवार्य हो गया है। यहां तक कि शहरों में मकान मालिक भी किरायेदारों से वेरिफिकेशन कराने लगे हैं। इस व्यवस्था के चलते जिनके खिलाफ कोई भी प्राथमिकी दर्ज है, उन्हें पुलिस सत्यापन के आधार पर चरित्र प्रमाण पत्र नहीं दिया जाता, चाहे वे दोषी सिद्ध हुए हों या नहीं। केशरी ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ व डीजीपी उत्तर प्रदेश को एक मांग पत्र भेजकर अपील की है कि इस व्यवस्था में बदलाव किया जाए। उनका कहना है कि जब तक कोई न्यायालय से दोषी सिद्ध न हो, तब तक उसके खिलाफ दर्ज मुकदमे की जानकारी सहित चरित्र प्रमाण पत्र जारी किया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि पुलिस वेरिफिकेशन की वर्तमान प्रणाली विशेषकर नक्सल प्रभावित इलाकों में युवाओं को मुख्यधारा से जुड़ने से रोकती है। वे आगे कहते हैं, यदि युवाओं को बिना दोषसिद्धि के अपराधी जैसा व्यवहार झेलना पड़ेगा, तो वे नौकरी की उम्मीद छोड़ गलत रास्तों पर जा सकते हैं। राकेश केशरी ने मांग की है कि प्रदेश सरकार समाजहित में इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करे, ताकि एक अभियुक्त तब तक अपराधी न माना जाए जब तक कोर्ट से सजा न मिले।
- चरित्र प्रमाण पत्र व्यवस्था में सुधार की मांग, सामाजिक कार्यकर्ता ने उठाई आवाज
- “केवल आरोप नहीं, न्यायालय का निर्णय जरूरी” – वेरिफिकेशन पर राकेश केशरी का बयान
- प्राइवेट जॉब और किराएदारी में वेरिफिकेशन से बढ़ रही समस्याएं

Author: Pramod Gupta
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