सोनभद्र। ओबरा–बिल्लि-मारकुंडी की पत्थर खदानों में बारूद से पहले मज़दूर का पसीना गिरता है-और कई बार उसका लहू भी। सवाल यह है कि जब Directorate General of Mines Safety (डीजीएमएस) की जाँच और आदेश मौजूद हैं, तब ज़मीन पर नियमों की धज्जियाँ किसके इशारे पर उड़ रही हैं? क्या Mines Act, 1952 की धाराएँ सिर्फ काग़ज़ी स्याही बनकर रह गई हैं?
जाँच बनाम जमीनी हक़ीक़त
बताया गया-सुधार करो, सुरक्षा मानक दुरुस्त करो, रिपोर्ट दो।
पर अगर उसी दौरान ट्रक बोल्डर से लदे निकल रहे हों, ड्रिल की चीख़ और ब्लास्टिंग की गूंज रात को चीर रही हो-तो यह सुधार नहीं, सिस्टम पर करारा तमाचा है।
कहा जाता है-“कार्रवाई हुई।”
मगर ज़मीन पूछती है-“कहाँ हुई?”
मज़दूर का लहू, किसके खाते में?
वो हादसे अभी भूले नहीं गए, जब धमाकों ने कई घरों के चूल्हे बुझा दिए। माताएँ आज भी चौखट पर आँखें टिकाए बैठी हैं।
मगर खनन सिंडिकेट की चांदी जारी है-काली कमाई की रफ़्तार में इंसानी जानें सस्ती पड़ती दिखती हैं।
“जो रोटी की तलाश में पत्थर तोड़ता है,
वही हर रोज़ मौत से आँखें जोड़ता है।”
कुम्भकर्णी नींद या सन्नाटा?
शासन-प्रशासन की खामोशी पर उँगलियाँ उठ रही हैं।
क्या यह महज़ लापरवाही है या फिर चुप्पी की कोई और कीमत है?
क्या संयुक्त निरीक्षण हुआ?
क्या जाँच रिपोर्ट सार्वजनिक की गई?
क्या दोषियों पर दंडात्मक कार्रवाई दिखी?
जब पत्रकार ने खदान अधिकारी से पूछा-“जान हथेली पर रखकर काम करने वाले मज़दूरों की सुरक्षा का क्या?”
तो कथित जवाब चुभता है-
“क्या मैं नर-पिशाच हूँ?”
सवाल यह नहीं कि कौन क्या है-
सवाल यह है कि मानवीय करुणा कहाँ है?
सिंडिकेट बनाम संवेदना
खनन से राजस्व आता है-यह तर्क बार-बार दोहराया जाता है। पर अगर हाई-वॉल अस्थिर है, बेंचिंग मानक से बाहर है और फिर भी बारूद फोड़ा जा रहा है-तो यह विकास नहीं, विनाश का अनुबंध है।
“पत्थर दिल हुक्मरानों से क्या फ़रियाद करें,
जिन्हें लहू की बू भी मुनाफ़े सी लगे।”
“मज़दूर की चीख़ दब गई बारूद की आवाज़ में,
सत्ता की चौखट तक क्यों न पहुँची ये साज़िश?”
जनमानस पूछ रहा है-क्या ऊपर तक सच्चाई पहुँची है?
क्या जिम्मेदारों की जवाबदेही तय होगी?
या फिर फाइलों में धूल जमती रहेगी और खदानों में धूल उड़ती रहेगी?
मांगें स्पष्ट हैं
डीजीएमएस की जाँच रिपोर्ट और अनुपालन स्थिति सार्वजनिक हो।
स्वतंत्र सेफ्टी ऑडिट और ड्रोन सर्वे कराया जाए।
अवैध खनन व परिवहन पर सख़्त कार्रवाई हो।
मजदूरों के लिए अनिवार्य सुरक्षा उपकरण, प्रशिक्षण और बीमा सुनिश्चित हो।
“सोनभद्र की धरती विकास का गीत गाए,
पर मज़दूर के लहू से ये सुर न सजाए।”
यह लड़ाई सिर्फ पत्थर की नहीं-
यह इंसानियत की है।
अगर सिस्टम अब भी न चेता, तो यह गूंज पहाड़ों से निकलकर सियासत की दहलीज तक पहुँचेगी।
Author: Pramod Gupta
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