December 14, 2025 1:30 pm

खनन के लालच में दफन होती इंसानियत- प्रकृति का विलाप, मजदूरों की चीखें और प्रशासन की चुप्पी

– पेड़ों की चीख, पत्थरों का आह्वान है,
इंसान के लालच से प्रकृति बदहवास है।

सोनभद्र। खनन बेल्ट कभी अपनी गगनचुंबी हरियाली, पहाड़ियों और प्राकृतिक खूबसूरती के लिए जाना जाता था। लेकिन आज यही धरती मौत का कुंड बन चुकी है। पर्यावरण की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं, मजदूरों के जीवन से खिलवाड़ किया जा रहा है और इंसानियत शर्मसार है। जो विभाग सुरक्षा मानकों और नियमों की रखवाली के लिए बने हैं, वे हाथी के दाँत साबित हो रहे हैं- दिखाने के और, खाने के और। खनन क्षेत्र में बार-बार होने वाले हादसों ने यह साबित कर दिया है कि प्रशासन और शासन कुम्भकर्णी नींद में सोए हुए हैं। डबल इंजन की सरकार में विकास का नारा गूंजता जरूर है, मगर ज़मीनी हकीकत यह है कि विकास के नाम पर प्रकृति का विध्वंस और दोहन जारी है। खनन कंपनियाँ नियमों का मखौल उड़ाते हुए न केवल पर्यावरण को तबाह कर रही हैं, बल्कि मजदूरों की जान को दांव पर लगाकर प्रलय के लिए विनाश लीला की तैयारी भी कर रही हैं। स्थानीय लोगों की पीड़ा यह है कि हादसों के बाद भी खदानें बंद नहीं होतीं, बल्कि नाम बदलकर, नए पट्टे जारी करके अवैध खनन फिर से चालू हो जाता है। यह एक गहरी साज़िश है, जिसमें विभागीय अधिकारियों की मिलीभगत साफ दिखाई देती है। हादसों में मरने वाले मजदूरों की चीखें प्रशासन के कानों तक नहीं पहुँचतीं। हर मौत सिर्फ आंकड़ों में बदलकर फाइलों में दबा दी जाती है। खनन से निकलने वाली धूल, टूटते पहाड़, बर्बाद होता जंगल और नष्ट होती जलधाराएँ आने वाले समय में भयंकर संकट का संकेत हैं। यह क्षेत्र पाताल लोक जैसा प्रतीत होने लगा है जहाँ न इंसान की सुरक्षा मायने रखती है, न ही पर्यावरण की। जिम्मेदार विभाग अगर समय रहते चेत न सके, तो यह विनाशकारी गतिविधियाँ आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रलय की घड़ी साबित होंगी।

पर्वत रो रहा है, दरिया भी खामोश है,
लालच के हाथों कैसा इंसाफ़ है, कैसा दोष है।

Pramod Gupta
Author: Pramod Gupta

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